दलितों को मोहरा बनाकर अपनी राजनीति चमकाने वाले कई ऐसे नेता हैं जो सत्ता का सुख भोग रहे हैं. इन सबमें सबसे पहला नाम मायावती का आता है जो बसपा सुप्रीमों भी हैं. इन दिनों मायावती दलितों को लेकर एक नया कार्ड खेल रही हैं, लेकिन इस बार यह कार्ड दलित हित नहीं बल्कि खुद के स्वार्थ के लिए है. दरअसल उत्तर प्रदेश में कई ऐसे पूर्व मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने सरकारी बंगले पर कब्ज़ा कर रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने इन बंगलों को खाली करने का आदेश दिया है. इस आदेश को अमलीजामा पहनाने के लिए यूपी की योगी सरकार ने कोशिशें भी तेज कर दीं है. जिसके बाद से मायावती कुछ ऐसा कर गईं, जिनसे उनका स्वार्थ साफ़ झलकता है.

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि..

इस बारे में न्यूज़ 18 लिखता है कि, “सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने अब सरकारी बंगले खाली करवाने की कवायद शुरू कर दी है. इसको देखते हुए सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों ने नए आशियाने ढूंढने शुरू कर दिए हैं. सरकारी बंगले खाली करने के लिए पूर्व मुख्यमंत्रियों को मई महीने तक का समय दिया गया है.”

दलितों का प्रयोग जारी है

जहां एक तरफ योगी सरकार बंगले खाली करवाने में लगी है वहीं दूसरी तरफ प्रदेश की लगभग चार बार मुख्यमंत्री रह चुकीं मायावती ने अपने बंगले को बचाने के लिए एक ऐसा जुगाड़ किया है जिसे देख आप आसानी से समझ जायेंगे कि मायावती दलितों के लिए राजनीति नहीं बल्कि अपने स्वार्थ के लिए दलितों का प्रयोग करती हैं.

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सरकारी बंगला नहीं छोड़ना चाहतीं

बता दें कि मायावती जिस बंगले (13 A माल एवेन्यू) में रहती थीं, SC के आदेश के बाद उन्हें यह बंगला छोड़ना होगा. बता दें कि अब मायावती 13 A माल एवेन्यू के बगल में ही स्थित 9 माल एवेन्यू में शिफ्ट होंगी. इसके बाद भी मायावती 13 A माल एवेन्यू को नहीं छोड़ना चाहती और इसके लिए उन्होंने दलित कार्ड खेल दिया है.

सरकारी बंगले पर लगा दिया ये बोर्ड

मायावती के सरकारी आवास 13 ए माल एवेन्यू पर लगा ये बोर्ड

सब जानते हैं कि दलितों और सर्व समाज में मा. कांशीराम की छवि काफी अहम है, इसको देखते हुए मायावती ने अपने सरकारी बंगले पर “श्री कांशीराम जी यादगार विश्राम स्थल” का बोर्ड लगा दिया है. इसके पीछे उनका मकसद जो समझ में आ रहा है वो ये कि, “पूर्व मुख्यमंत्री के नाम पर तो ये बंगला खाली करवाया जा सकता है लेकिन इसको दलितों के सम्मान से जोड़ा जायेगा तो शायद योगी सरकार इसे ना छुए.” इन सबके बीच मायावती शायद ये भूल जाती हैं कि ये आदेश योगी सरकार का नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट का है, और न्यायपालिका से बड़ा कुछ भी नहीं.

13 ए माल एवेन्यू

जब बात सुख की आई तो दलित याद आये

इस बोर्ड से एक चीज और साफ़ हो जाती है वो ये कि, “जब मायावती को अपने स्वार्थ की फ़िक्र होती है तब-तब वो दलित कार्ड खेल जाती हैं, और अपने सुख का इंतजाम कर जाती हैं.” फ़िलहाल मायावती को अब समझना होगा कि उनकी गिरती राजनीति के साथ-साथ दलितों में सोचने और समझने की शक्ति बढ़ी है, और अब उन्हें और बेवकूफ बनाकर मायावती ज्यादा दिन तक राजनीति नहीं चमका सकतीं.