इस देश में मीडिया से यही उम्मीद की जाती है कि वो बिना किसी भेदभाव के साथ हर खबर को निष्पक्षता के साथ पेश करे, लेकिन आज के दौर में ऐसा होना टेढ़ी खीर के समान है. मीडिया संस्थानों में अब धर्म के आधार पर भी भेदभाव करके किसी खबर का एंगल सेट किया जाता है. इसका ताजा उदाहरण अभी हाल ही में देश के भीतर हुए कुछ रेप के मामलों में देखने को मिला है.

भारतीय मीडिया ने आज के दौर में निष्पक्षता को हाथ लगाना छोड़ दिया है (फोटो सोर्स: Scroll.in)

कभी किसी का रेप हुआ तो मीडिया ने उस आरोपी को या दोषी को रेपिस्ट के तौर पर नहीं बल्कि उसके धर्म के आधार पर पेश करने की सोच दिखाई, लेकिन ये सोच सिर्फ एक विशेष धर्म तक ही सीमित रह गयी है. मीडिया की इसी सोच पर करारा प्रहार करते हुए विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय शंकर तिवारी ने एक ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने धर्म के आधार पर भेदभाव करने वाली मीडिया को जमकर लताड़ा है.

विजय शंकर तिवारी की इस बात से मीडिया की असली सोच को समझना बड़ा आसान है (फोटो सोर्स: ट्विटर)

विजय शंकर तिवारी को आपने कई न्यूज़ चैनलों पर डिबेट करते हुए भी देखा होगा. वो अपने विचारों को बड़ी ही बेबाकी से रखते हैं और कुछ ऐसा ही उनके ट्वीट में भी देखने को मिला. उन्होंने भेदभाव करने वाले मीडिया संस्थानों पर निशाना साधते हुए लिखा कि:

विश्व हिन्दू परिषद् के राष्ट्रीय प्रवक्ता विजय शंकर तिवारी के ट्विटर अकाउंट से लिया गया ट्वीट

हिन्दू धर्म को बदनाम करना हो तो ‘अवार्ड वापसी गैंग’ एक्टिव हो जाती है

दरअसल विजय शंकर तिवारी के इस ट्वीट को समझने की कोशिश करें तो उनकी यह बात ठीक भी लगती है. क्योंकि बात अगर मोदी सरकार को घेरने की हो, बात अगर हिन्दू धर्म को बदनाम करने की हो तो ‘अवार्ड वापसी गैंग’ झट से एक्टिव हो जाती है. फ़िलहाल हर धर्म में ऐसे लोग मौजूद होते हैं जो घिनौने कृत्यों को अंजाम देते हैं लेकिन न्यूज़ चैनल जिस तरीके से सिर्फ हिन्दू धर्म के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं, उनका ये भेदभाव साफ नजर आता है.

इसीलिए शायद विजय शंकर तिवारी ने लिखा है कि, ‘अगर कोई मामला किसी ‘मंदिर’ और किसी ‘पंडित’ को लेकर होता तो मीडिया उनकी फोटो कई बार दिखाकर वाहवाही लूटता, लेकिन अब जबकि केरल में रेप के मामले में 5 पादरियों के फंसने और रांची में करीब 280 बच्चे को बेचे जाने की खबर में चर्च का नाम आया है तो ऐसे में मीडिया एकदम सन्न है.’

आखिर ऐसा भेदभाव क्यों? मीडिया तो निष्पक्षता के लिए जाना जाता है, तो फिर धर्म के आधार पर खबर दिखाने की बात क्यों ?

मीडिया के इस तरीके के कामों से देश में संघर्ष पैदा हो सकता है 

कहने को तो इस देश में मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहते हैं और इससे उम्मीद करते हैं कि बड़ी ही निष्पक्षता के साथ उन तमाम मुद्दों को सामने लाएगी जो जनहित से जुड़े हुए होते हैं, देश से जुड़े होते हैं. इस उम्मीद को झटका तब लगता है जब मीडिया संस्थानों द्वारा पक्षपात किया जाता है. खबर कैसी भी हो उसे एक विशेष एंगल देकर उस खबर का असली मकसद ही तोड़-मरोड़ देते हैं. ऐसे कृत्यों से आम जनता का नुकसान तो होता ही है साथ ही देश के भीतर संघर्ष भी पैदा होता है.

मीडिया ने भी पहना एक खास चश्मा

संघर्ष इसलिए कहा गया है क्योंकि इस देश में कई धर्मों के लोग एकसाथ रहते हैं लेकिन उनके बीच अगर मीडिया भी भेदभाव करके खबरें दिखाए तो संघर्ष होना लाजमी है. बीते दिनों देश के तमाम क्षेत्रों से रेप की ख़बरें सामने आयीं. इन घटनाओं में रेपिस्ट को रेपिस्ट की तरह नहीं बल्कि धर्म के चश्में देखा गया. इस चश्में को मीडिया ने भी पहना और उस चश्में से जो दिखा, उसी हिसाब से खबर बना दी. अब तय आपको करना है कि मीडिया के इस भेदभाव से आप किस तरह से अपने आपको अलग रख पाते हैं.

आपके लिए एक सवाल:

आप विजय शंकर तिवारी की बात से कितने सहमत हैं ?