परमाणु बम का आविष्कार अब तक का सबसे भयंकर आविष्कार है। द्वितीय विश्व युद्ध में नागासाकी और हिरोशिमा का जो हाल हुआ था वो इसी के कारण था और जिसे आज तक भी भुलाया नहीं जा सकता । और भी डरा देने वाली बात ये है कि लगबग हर देश के पास अब यह विनाशकारी हथियार है जिनमे से कुछ देश तो ऐसे भी है जो इस प्रलयकारी हथियारों  को चलाने की धमकी अक्सर देते रहते हैं। अगर सच में कभी तीसरा विश्व युद्ध आ खड़ा हुआ और उस दौरान ऐसा परमाणु बम छोड़ दिया गया तो पृथ्वी का अंत निश्चित है।

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इसी के साथ ही एक गहन बात यह भी है कि जिस परमाणु बम और उसके द्वारा हुए विनाश के बारे में आज हम जानते हैं उसका धरती पर आतंक मचाना, पहली बार की बात नहीं है। परमाणु बम विश्व्य युद्ध से 5000 साल पहले हमारे भारत में ही इस्तेमाल किया गया था।

महाभारत युद्ध में महाप्रलय लाने की क्षमता रखने वाले अस्त्र शस्त्रों और विमान रथों के उल्लेख के साथ साथ एटामिक तरह के युद्ध का परिचय भी मिलता है । इस युद्ध के एटामिक वृतान्त से ऐसी जानकारी प्राप्त होती है जिसे सुनकर आप दंग रह जायेंगे । उस वक़्त संहारक शस्त्रों का प्रयोग ही नहीं बल्कि इन्द्र के वज्र अपने चक्रदार रफलेक्टर के माध्यम से संहारक रूप में प्रगट होता है। यही अस्त्र जब दागा गया तो एक विशालकाय अग्नि पुंज के समान उभर अपने लक्ष्य को निगल लिया था।

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यह कितना विनाशकारी रहा होगा इसका अंदाजा महाभारत के इस स्पष्ट वर्णन से लगाया जा सकता हैः-

“अत्यन्त शक्तिशाली विमान से एक शक्ति – युक्त अस्त्र प्रक्षेपित किया गया…धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा…वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया…उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे…बिना किसी प्रत्यक्ष कारण के बर्तन टूट गए थे और पक्षी सफेद पड़ चुके थे…कुछ ही घण्टों में समस्त खाद्य पदार्थ संक्रमित होकर विषैले हो गए…उस अग्नि से बचने के लिए योद्धाओं ने स्वयं को अपने अस्त्र-शस्त्रों सहित जलधाराओं में डुबा लिया…”

इस वर्णन का दृश्य रूप बहुत हद तक हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के…

इस वर्णन का दृश्य रूप बहुत हद तक हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु विस्फोट के दृश्य  से मिलता है l

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प्राचीन भारत में परमाणु विस्फोट के कई और भी साक्ष्य मिलते हैं। जोधपुर (राजस्थान) से पश्चिम दिशा में लगभग दस मील की दूरी पर तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव राख की मोटी परत जमी है l वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे।

ब्रह्मास्त्र दिव्यास्त्र परमपिता ब्रम्हा का सबसे मुख्य अस्त्र माना जाता हैl यह एक परमाणु हथियार है जिसे दैवीय हथियार बताया गया है l कहा जाता है कि यह अचूक है और सबसे भयंकर और प्रलयकारी अस्त्र है। जो भी इसे छोड़ता है वह इसे वापस लेने की क्षमता भी रखता है पर अश्वत्थामा को इसे वापस लेने का तरीका नहीं याद था जिसकी वजह से लाखों लोगों की जानें चली गई थींl

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अश्वत्थामा के ऐसा करने से कृष्ण बड़े क्रोधित हो उठे थे और उन्होंने अश्वथामा को एक शाप दे दिया कि कि ‘तू इतने वधों का पाप ढोता…

कृष्ण ने अश्वत्थामा को शाप दिया कि ‘तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ तीन हजार वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।’ व्यास ने श्रीकृष्ण के वचनों का अनुमोदन किया।

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प्राचीन भारत में यह अस्त्र कुछ गिने चुने योद्धाओं के पास ही था l रामायण के काल में जहाँ यह विभीषण और लक्ष्मण के पास था, वहीँ महाभारत के समय पर यह युधिष्ठिर, कर्ण, अश्वत्थामा, कृष्ण, द्रोणाचार्य, प्रद्युम्न और अर्जुन, आदि के पास था l कहा जाता है कि अर्जुन को यह अस्त्र इंद्र ने भेंट किया था।

जब भी परमाणु बम चलाने की बात आती है तो सभी के मस्तिष्क में जापान और अमेरिका के बीच हुए युद्ध की छवि बनती नज़र आती है पर यह सच नहीं।  इस युद्ध से 5000 वर्ष पहले ही धरती पर ऐसा विनाशकारी विस्फोट हो चुका है।

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इस बात का उल्लेख करने वाले खुद रोबर्ट ओपेनहाइमर ही थे जो परमाणु बम के आविष्कारक हैं। जिस प्रोजेक्ट के तहत अमेरिका ने हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराए थे, उस प्रोजेक्ट का नाम था ‘मैंनहैटन’ l  इसी प्रोजेक्ट के पुरेधा थे रोबर्ट ओपेनहाइमर जिन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान…

अपने इंटरव्यूज में जब भी रोबर्ट ओपेनहाइमर इस प्रोजेक्ट और परमाणु बम की बात करते तब वे हिन्दू धर्म की गीता की कुछ पंक्तिया भी बताते।

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रोबर्ट ने इस बात को माना कि पुरानी सभ्यताए बहुत ही उन्नत थी और हम उनसे बहुत पीछे हैं और वो 5000 साल पहले से ही परमाणु बम का प्रयोग युद्ध में करते आए है। सन, 1939 से 1945 के बीच रॉबर्ट ने महाभारत में बताए गए…

सन, 1939 से 1945 के बीच रॉबर्ट ने महाभारत में इस्तेमाल हुए ब्रह्मास्त्र की प्रलय क्षमता पर रिसर्च की। उन्होंने और उनके साथ लगे वैज्ञानिकों की टीम ने इस रिसर्च को ट्रिनिटी (त्रिदेव) नाम दिया। सफलता रंग लायी और 16 जुलाई (1945) को उन्होंने परमाणु बम का परीक्षण किया।

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सन 1969-70 के पुणे बेस्ड राइटर डॉ. पद्माकर विष्णु वर्तक ने एक किताब लिखी जिसका नाम है ‘स्वयंभू’। इस किताब में पाया गया है कि महाभारत के ज़माने में जो ब्रह्मास्त्र इस्तेमाल किया गया था वह परमाणु बम के जैसा ही था । यही नहीं उससे और पहले रामायण के युग में भी…

उससे पहले रामायणकाल में भी ब्रह्मास्त्र का वर्णन मिलता है, यानि प्राचीन भारत में महाविनाशकारी अस्त्र सबसे पहले अस्तित्व में आए।

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रामायण में मेघनाद से युद्ध के लिए भी लक्ष्मण ने जब ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कहकर रोक दिया की अभी इसका प्रयोग उचित नहीं, क्योंकि इससे पूरी लंका साफ हो जाएगी।

वेद-पुराणों आदि में यह वर्णन मिलता है कि परमपिता ब्रह्मा ने दैत्यों और दानवों के नाश के लिए ब्रह्मास्त्र की उत्पति की थी l अस्त्र उस वक्त शस्त्रों से बहुत अधिक घातक होते थे l शुरुआत से ब्रह्मास्त्र देवी और देवताओं के पास ही हुआ करता था l देवताओं ने सबसे पहले गंधर्वों को यह अस्त्र दिया। बाद में यह इंसानों ने हासिल किया।

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देवी देवताओं के पास भी यह उनकी विशेषताओं के अनुसार होता है l हर एक ब्रह्मास्त्र भिन्न-भिन्न देव या देवी का अधिकार होता है और मंत्र, तंत्र और यंत्र के द्वारा उसका संचालन होता है l यह अचूक है और इसका प्रतिकार दूसरे ब्रह्मास्त्र से ही हो सकता है, वर्ना नहीं।

सिन्धु घाटी सभ्यता (मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि) में हुए अनुसंधान से ऐसे कई नगर मिले हैं, जो…

सिन्धु सभ्यता (मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि) की खोज के बाद भी ऐसे कई नगर मिले हैं, जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व अस्तित्व में थे। यहाँ मिले नरकंकालों की स्थिति से भी ज्ञात होता है कि मानो इन्हें किसी अकस्मात प्रहार से मारा गया है।इसके साथ ही यहाँ भी किसी समय में भयंकर ऊष्मा उत्पन्न होने की बातें कही जाती हैं ।

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इन नरकंकालों का अध्ययन करन से पता चला कि इन पर रेडियेशन का असर भी था। महर्षि वेदव्यास लिखते हैं कि जहां ब्रह्मास्त्र छोड़ा जाता है वहां…

महर्षि वेदव्यास ने ब्रह्मास्त्र के विनाश के बारे में बताते हुए लिखा है कि जहाँ भी यह छोड़ा जाता है वहां १२ वर्ष तक जीव-जंतु, पेड़-पौधे आदि की उत्पत्ति नहीं हो अपती है l महाभारत में भी यह पाया गया है कि ब्रह्मास्त्र के कारण गांव में रहने वाली स्त्रियों के गर्भ मारे गए।

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अब इन सभी बातों को देखा जाए और हिरोशिमा नागासाकी में हुए विस्फोट से जोड़ा जाए तो कमाल की समानताएं मिलेंगी l हिरोशिमा में भी रेडिएशन फॉल आउट होने के कारण गर्भ मारे गए थे और वहां पर भी 12-13 वर्ष तक आकाल रहा l

कहते हैं कि परमाणु बम हमले के बाद हिरोशिमा के ढाई लाख निवासियों में 70-80 हजार की फौरन मौत…

बताया जाता है कि परमाणु बम विस्फोट के बाद हिरोशिमा के ढाई लाख निवासियों में से करीब 70-80 हजार लोगों की फौरन ही मौत हो गई थीl धमाके से जो गर्मी फैली थी उससे पेड़ पौधे और जानवर भी झुलस गए थे l धमाके से करीब 150 मीटर कि दूरी पर शहर के वाणिज्य मंडल की इमारत को छोड़कर कोई भी इमारत परमाणु बम की ताकत को बर्दाश्त नहीं कर पाई थी l

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इस धमाके से आस पास के लोग तो बचे ही नहीं थेl दूर के जो लोग बच गए थे उनका शरीर बुरी तरह से जल गया था l यहाँ मौत का सिलसिला महीनो महीनो तक जारी रहा था l धमाके के पांच साल बाद इन हमलों में मरने वालों की संख्या हो गई थी …

धमाके के पांच साल बाद इन हमलों से मरने वालों की संख्या तकरीबन 230,000 आंकी गई थी l नगसके में भी फैट मैन नामका बम हिरोशिमा हमले के ठीक 3 दिन बाद गिराया गया था जिसमे तुरंत मरने वालों की संख्या करीब 40,000 थी l

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आप में से शायद ही कोई यह बात जानता हो कि अमेरिकी सेना ने परमाणु बम गिराने के लिए जापान के चार शहरों की एक सूची तैयार की थी और इसमें नागासाकी का नाम पहले शामिल नहीं था l

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