संस्कृत दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा है प्राचीन होते हुए भी ये अब तक की सबसे शुद्ध भाषा है और ये ही वजह है कि संस्कृत से कई भाषाओँ का जन्म हुआ है इनमें हिंदी, मैथिली, उर्दू, बांग्ला, उड़िया जैसी भाषाएं भी शामिल हैं. यहाँ तक कि यूरोप की कई भाषाओं की जननी भी संस्कृत ही मानी जाती है.  संस्कृत को देववाणी के नाम से भी पुकारा जाता है. हिन्दू, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में लिखे गए हैं.  एक दौर में आम जन-मानस की भाषा संस्कृत हुआ करती थी लेकिन बदलते वक्त के साथ ये केवल पूजनीय भाषा बनकर रह गई है. अब संस्कृत का इस्तेमाल केवल हिन्दू रीति-रिवाजों और विशेष समारोह में ही किया जाता है.

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जिस भाषा ने दुनिया को बोलना सिखाया आज वो धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है. अंग्रेजी की चका-चौंध ने लोगों को आकर्षित कर दिया है और लोग वास्तविकता से दूर होते जा रहे हैं. तर्क दिया जाता है कि संस्कृत एक कठिन भाषा है लेकिन काफी समय पूर्व जानी मानी पत्रिका फ़ोर्ब्स ने माना था कि संस्कृत कम्प्यूटर सॉफ्टवेयर के लिए सबसे  उपयुक्त भाषा है और इसका कारण ये दिया गया था कि संस्कृत सबसे शुद्ध भाषा है लेकिन शुद्ध होते हुए भी इसको आज भुला दिया गया है.

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अपनी इसी शुद्धता के कारण कई भाषाओँ में संस्कृत के शब्द उपलब्ध हैं. संस्कृत ने न केवल भारतीय समाज को प्रभावित किया बल्कि दूर-दराज के देशों की जुबान में भी इसने अपना स्थान बनाया. आज हम संस्कृत के उन पहलुओं से आपको रूबरू करवाएंगे जिन्हें जानकर आपको संस्कृत की महानता का पता चलेगा. आप जानेगें कि कैसे संस्कृत ने अपनी शुद्धता के कारण पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई.

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इराक़ की राजधानी बग़दाद का नाम संस्कृत से निकला है. बग़दाद का अर्थ होता है ‘भगवान प्रदत्त’ यानी भगवान् की देन संस्कृत का भग: शब्द फ़ारसी में बग हो गया और दत्त बन गया दाद और इस तरह भग:दत्त यानी भगवान की देन शब्द से बग़दाद शब्द बन गया. बग़दाद की हरी-भूमि को देखकर किसी ने उसे भगवान् की देन कहा होगा जिसके बाद उसका ये नामकरण हुआ.

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इसी तरह अफगानिस्तान का नामकरण भी संस्कृत से हुआ. पुराने वक्त में अफगानिस्तान को निपुण घुड़सवारों की धरती कहा जाता था. जिसको संस्कृत में ‘अश्वक’ पुकारा जाता था और प्राकृत में बदलकर ये हो गया ‘आवगन’ और फिर पारसी में ये बन गया ‘अफगान’ और  स्थान का प्रत्यय “स्तान” मिलकर ये बन गया अफगानिस्तान यानी निपुण घुड़सवारों की जगह.

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इस्लाम में खुदा को याद करने के लिए जो पद्धति अपनाई जाती है उसे कुरान के हिसाब से तो सलात कहा जाता है लेकिन मुस्लिम इसे नमाज़ के नाम से ज्यादा जानते हैं. वो खुदा को याद करने के लिए नमाज़ अदा करते हैं. नमाज़ शब्द भी संस्कृत से निकला हुआ है. नमाज़ शब्द संस्कृत धातु नमस् की देन है. इसका सर्वप्रथम उपयोग ऋगवेद में हुआ और इसका अर्थ होता है आदर और भक्ति में झुक जाना.

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संस्कृत शब्द नमस् की यात्रा भारत से शुरू हुई और इसके बाद ईरान पहुंची जहाँ फ़ारसी लोग इसे नमाज़ पुकारने लगे. धीरे-धीरे अफगानिस्तान, तुर्कमानिस्तान, तज़ाकिस्तान, इंडोनेशिया और मलेशिया के मुसलामानों के दिलों में भी इस नमस् यानी नमाज़ शब्द ने अपनी जगह बना ली. ऐसा नहीं है कि संस्कृत ने केवल पश्चिम के मुल्कों को प्रभावित किया हो पूर्वी मुल्क चीन में भी संस्कृत से निकले शब्द मौन ने चीनियों के दिल में जगह बनाई और उन्हें असीम आनंद से अवगत करवाया.

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संस्कृत की विशेषताओं के बारे में कुछ भी कहना कम ही होगा क्योंकि, संस्कृत से शुद्ध और शालीन भाषा दुनिया में कोई नहीं है लेकिन शुद्ध होने पर भी इसे भुला दिया गया है क्योंकि इसकी उपयोगिता को लोग अब समझ नहीं पा रहे हैं. ये वही भाषा है जिसमें लिखे मन्त्रों को उच्चारण मात्र करने से ऊर्जा का अनुभव होता है. भारत के महान संत स्वामी विवेकानंद ने भी संस्कृत को लेकर कई बातें कहीं थी जो आज के युवाओं को ज़रूर पढ़नी चाहिए.