‘राजनीति में कोई किसी का नहीं होता’ ये बात आपने कई बार सुनी होगी. इस बात के कई उदाहरण भी हैं और उन्हीं में से एक है मायावती और अटल बिहारी वाजपेयी के बीच हुआ एक वाकया. 1998 में भारत की राजनीति के भीष्म पितामह कहे जाने वाले पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा दूसरी बार सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और अटल बिहारी वाजपेयी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने.

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इस दौरान जब तक वो प्रधानमंत्री रहे उन्होंने दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए पोखरण में पाँच भूमिगत परमाणु परीक्षण विस्फोट कर सम्पूर्ण विश्व को भारत की शक्ति का एहसास कराया, लेकिन वो ज्यादा दिनों तक भारत के प्रधानमंत्री नहीं रह पाए. महज 13 महीनों के बाद ही उनकी सरकार गिर गई क्योंकि गठबंधन की अहम सहयोगी जयललिता की एआईएडीएमके ने समर्थन वापस ले लिया. सरकार अल्पमत में आ गई.

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इसके बाद वाजपेयी जी का साथ देने के लिए सामने आई उत्तर प्रदेश में बीजेपी के सहयोग से मुख्यमंत्री रह चुकी बीएसपी सुप्रीमो मायावती. मायावती ने अटल जी के राजनीतिक प्रबंधकों को यह भरोसा दिलाया था कि वह NDA का समर्थन करेंगी. उस वक्त ऐसे हालत थे कि एक-एक वोट की कीमत थी.

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जिस दिन विश्वास मत पर वोटिंग होनी थी उस दिन मायावती, अटल बिहारी वाजपेयी से मिलने गईं मायावती ने उनके पैर छुए और साथ ही ये भी कहा कि वो छह सांसदों का समर्थन देंगी, लेकिन लोकसभा में पहुंचकर मायावती पलट गईं. मायावती के पार्टी के सांसदों ने अटल जी की सरकार के खिलाफ वोट दिया और महज एक वोट से सरकार गिर गई. मायावती ने इसके बाद प्रेस को बयान दिया और कहा कि मैंने जान बूझकर भाजपा को मुर्ख बना दिया.