पीएम मोदी का इजराइल दौरा…

इन दिनों पीएम मोदी इजराइल की यात्रा पर हैं और वहां उनका काफी ज़ोरदार स्वागत हुआ है. इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू  ने रेड कारपेट बिछाकर पीएम मोदी का स्वागत किया है. ख़ास बात ये रही कि इजराइल के पीएम ने अपने कोट में भारत का झंडा लगा रखा था. आपको बता दें इजराइल के प्रधानमंत्री ने मोदी के स्वागत में हिंदी में अपने भाषण की शुरूआत की थी. इन दिनों पूरे भारत में एक ही चर्चा है वो है भारत और इजराइल के रिश्ते लेकिन क्या आप उस लड़ाई के बारे में जानते हैं जिसमें भारतीय घुड़सवारों ने इजराइल की सुरक्षा की थी ? haifa war

 

वो लड़ाई जिसका नहीं है इतिहास में कहीं भी ज़िक्र…

आज हम आपको एक ऐसी ही लड़ाई के बारे में बताने वाले हैं जिसे जानकर आपको भारत पर और भी गर्व होगा. दरअसल इजराइल देश का इतिहास किताबों के अनुसार 70 वर्ष पुराना है लेकिन असलियत में इजराइल के बनने की मांग 2000 साल पहले ही शुरू हो गयी थी. बता दें इजराइल और भारत में काफी समानताएं हैं और दोनों की देश का इतिहास कुछ-कुछ एक जैसा है. इजराइल भारत को मात्रभूमि कहते हैं और इजराइल को पित्र्भूमि.

भारत और इजराइल के बीच समानताएं…

समानताओं की बात करें तो , पहली ये कि अलग होने से पहले यहां के लोग अंग्रेजों के गुलाम थे हमारी तरह और दोनों देशों को आज़ादी भी एक साल में अन्तर पर मिली. आज़ादी के बाद भारत भी तीन टुकड़ों में बंटा और इज़राइल भी तीन टुकड़ों का एक हिस्सा है. इज़राइल अपने दुश्मनों से घिरा हुआ है लेकिन फिर भी दुश्मनों को धूल चटाता रहता है, वहीं भारत की सीमा पर भी दुश्मनों की नजर बनी रहती है और आये दिन मुंह की खाते रहते हैं. चूँकि अब मोदी इसराइल के दौरे पर हैं तो ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि दोनों देश में काफी प्रगाढ़ सम्बन्ध स्थापित होंगे.

 

यात्रा के बीच पीएम मोदी जायेंगा हैफा जो आज सिर्फ भारत की वजह से अस्तित्व में है…

इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी एक ऐसी जगह जायेंगे जहां के इतिहास के पन्नों में भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों से लिखा है. आज भी उस जगह की हिस्ट्री की किताबों में भारत के उस योगदान के किस्से लिखे हैं. हम बात कर रहे हैं हैफा की जहां पीएम मोदी शहीद हुए भारतीय जवानों को श्रधांजलि देंगे. इस जगह को हैफा का भारतीय कब्रिस्तान भी कहा जाता है. हर साल 23 सितम्बर को हैफा डे मनाया जाता है. आपको बता दें यह कब्रिस्तान भारतीय घुड़सवारों की शहादत को याद करने के लिए बना था.

 

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हैफा की एतिहासिक कहानी…

हैफा की कहानी शुरू होती है 1918 से जब ओटोमन तुर्कों  ने हैफा को घेरा हुआ था. उन दिनों हैफा पहाड़ी जंगलों में घिरा हुआ गर्म शहर था जिसको तुर्क ने  चारों ओर से घेरा हुआ था. आधुनिक हथियारों से लेकर मशीन गन तक हैफा में तुर्क ने बुरी तरह से दहशत फैला रखी थी. इसके बाद शुरू होती है भारत के उस अनसुने योगदान की गौरवशाली कहानी जिसको जानकर आपको भारत पर गर्व होगा.

 

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टर्की की सेना के पास थे आधुनिक हथियार तो वहीं भारतीय घुड़सवार…

मशीन गन और एक से एक आधुनिक हथियारों लेकर खड़े टर्की सेना पर भारत की घुड़सवार फ़ौज एक इशारे पर हैफा में हमला किया.हमला करने वाले भारतीय सैनिकों के पास सिर्फ तलवारें थी और सामने मशीन गन. 23 सितंबर, 1918 को ब्रिटिश भारत की कैवलरी ब्रिगेड ने शहर पर कब्जा जमाए हुए ओटोमन तुर्कों पर हमला कर दिया था. घुड़सवार जोधपुर से आये थे लेकिन इस हमले एक ऐसी परेशानी हुई जो किसी ने नहीं सोची थी.

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जब मेजर को लग गयी गोली और ऑपरेशन पड़ गया खतरे में…

मेजर दलपत इस ऑपरेशन को सम्भाल रहे थे और उन्हीं के कहने पर जोधपुर की घुड़सवार सेना ने हैफा पर हमला किया था. हमले के दौरान जब घुड़सवार हैफा के पास पहुंचे तो उन्होंने देखा हैफा पानी से घिरा है और अंदर जाने का कोई रास्ता नहीं है, घुड़सवारों ने जबरन 2 घोड़ों को पानी की ओर धकेला पता चला सामने दलदल है जिसमें घोड़े जा धसे.इतने में ही सामने से 40 MM की गोलियों से फायरिंग स्टार्ट हो गयी जिसके बाद मेजर दलपत ने सोचा दूसरे रस्ते से जाया जाए लेकिन इतने में ही मेजर दलपत को गोली लग गयी और वो घायल हो गये.

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कैसा बचा इतिहास का सबसे खतरनाक ऑपरेशन ? 

अब इस ऑपरेशन का बुरा वक्त आ गया था और लगने लगा था के भारत को हार का सामना करना पड़ेगा लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था घायल मेजर की उसी रात मौत हो गयी और ऑपरेशन पूरी तरह से खतरे में आ गया. इसके बाद भारतीय घुड़सवारों का ज़िम्मा आ गया अमन सिंह नाम के मेजर पर जिन्होंने बखूबी अपना कर्ताय्व निभाया.अमन सिंह ने आदेश दिया की लड़ाई ज़ारी रहेगी और  भारतीय घुड़सवारों पर गोलियां बरसाई जा रही थीं. इसी बीच अमन सिंह को एक ऐसा रास्ता दिखा जहां से हैफा के अंदर प्रवेश किया जा सकता था और बिना समय खराब किये घुड़सवार हैफा के अंदर घुस गये और फिर तुर्की की सेना को बुरी तरह खदेड़ दिया. देखते ही देखते हैफा की सड़कों पर टर्की सैनिकों की लाश बिछ गयी.


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कब्ज़ा करने के बाद क्या हुआ ? 

इतने में ही अमन सिंह सेना की एक टुकड़ी को लेकर हैफा के वेस्ट पार्ट में गये और वहां मौजूद तुर्की सेना को भी धुल चटाते हुए उनके हथियार कब्ज़ा लिए.  इस ऑपरेशन को इतिहास में सबसे खतरनाक ऑपरेशन में से गिना जाता है और आज भी भारत के इस योगदान का समान इजराइल तहे दिल से करता है. जोधपुर घुड़सवारों की मदद मयसूर के राजा ने अपनी सेना को भेजकर की थी. इस हमले में भारत ने इजराइल में 700 बंधक बनाए और 2 जर्मन के ऑफिसर भी पकड़े. गन तो ना जाने कितनी ही कब्जे में की थी लेकिन इस हमले में भारत को भी अपना एक जाबाज़ ऑफिसर गवाना पड़ा साथ ही कई घोड़े और जवान भी शहीद हुए थे.

 

 

आज भी दिया जाता है भारतीय शहीदों को सम्मान…

इस लड़ाई का ज़िक्र बहुत कम किताबों में है लेकिन भारत के इतिहास की ये सबसे भयानक युद्ध में से एक है और इजराइल आज भी भारत के इस योगदान को हर साल याद करता है. हर साल 23 सितम्बर को हैफा डे मान्य जाता है. दिल्ली में 1922 में वहां शहीद हुए जवानों की याद में स्मृति भी बनाई गयी है.