पीएम  मोदी के इजरायल दौरे की वजह से पिछले कई हफ़्तों से भारत के हर मीडिया चैनल पर इजरायल और भारत की खबर छाई हुई है| पीएम मोदी एक बार फिर विदेश से भारत के रिश्तों को सुलझाने और सुलझे रिश्तों को और  बेहतर बनाने के लिए इजरायल गए हैं| खैर इन सब बातों के बीच इज़राइल से जुड़ी एक बहुत ही खास बात है जिसे हम शायद अब तक नज़रंदाज़ करते आये हैं| लगभग 80 लाख की आबादी वाले इस खूबसूरत देश से दुनिया सीखना चाहे तो ऐसी अनगिनत बातें हैं जिन्हें सीख कर हम क्या से क्या नहीं बन सकते| इज़राइल की सबसे बड़ी ख़ासियत में सबसे शीर्ष पर आता है इज़राइल का दबदबा|

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अमेरिका,रूस से कहीं ज्यादा शक्तिशाली है इज़राइल 

यूँ तो महाशक्तिशाली देशों का ज़िक्र होता है तो अमूमन लोग या तो अमेरिका का ज़िक्र करते हैं या रूस का लेकिन हकीकत में देखा जाये तो इज़राइल इनदोनो देशों से कहीं आगे है| अमेरिका और रूस खुद चाहे कितने भी शक्तिशाली क्यों ना हों लेकिन इज़राइल से पंगा लेना वो भी मुनासिब नहीं समझते| आप इसी बात से इज़राइल की ताकत का अंदाज़ा लगा सकते हैं| बता दें कि IS जैसा आतंकी संगठन जिसे पूरी दुनिया थरथराती है वो भी अगर किसी से डरता है तो वो है इज़राइल|

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जानिए क्या था “SIX DAY WAR”

बात अगर इज़राइल की ताकत की हो रही है तो ऐसा तो हो नहीं सकता कि हम जून 1967 के उस हमले का ज़िक्र ना करें जब इज़राइल ने महज़ 6 दिनों में दुश्मनों को धूल चटा कर उन्हें ये एहसास दिला दिया था कि उन्होंने इज़राइल से पंगा लेकर कितना गलत किया है| दरअसल 1967 में जब जार्डन, सीरिया और इराक सहित आधा दर्जन मुस्लिम देशों ने एकसाथ इजरायल पर हमला किया तो इज़राइल ने अकेले, अपने दमपर इस हमले का पलटवार करते हुए मात्र छह दिनों में इन सभी को धूल चटा दी थी। इस करारी हार को अरब देश आज तक भूल नहीं पाएं है। इतिहास में इस घटना को Six Day War के नाम से जाना जाता है।

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29 नवम्बर 1947 में फिलिस्तीन के तीन हिस्से हुए जिनमे से एक था इज़राइल 

द्वितीय विश्व युद्ध में जब यहूदीयों को बुरी तरह से ढूंढ-ढूँढकर मारा जा रहा था उस वक़्त किसी तरह अपनी जान बचा कर कुछ यहूदी येरुशलम में पनाह लेने पहुँच गए| इस बात की भनक लगते ही अरब देशों ने इसका विरोध किया जिसके बाद अरब देशों और इन शरणार्थी यहूदीयों के बीच युद्ध सा छिड़ गया| इस झगड़े के चलते ही संयुक्त राष्ट्र ने सन् 1947 में 29 नवम्बर को फिलिस्तीन के तीन हिस्से करने का फैसला किया| जिसके बाद इजरायल और फलस्तीन के रूप में दो राष्ट्रों को मान्यता दी गयी, जबकि तीसरा राष्ट्र येरूशलम को अलग राज्य बनाने की बात की गयी| हालांकि बाद में इजरायल ने येरूशलम को भी अपने देश में मिला लिया।

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इज़राइल अलग राष्ट्र तो बन गया लेकिन साथ ही कई मुस्लिम देश इज़राइल के दुश्मन बन बैठे

इज़राइल अलग राष्ट्र तो बन गया लेकिन अब उसके दुश्मन भी बढ़ चुके थे| एक तरफ था अकेला इज़राइल तो दूसरी तरफ थे इराक, लेबनान, सीरिया, मिश्र लीबिया, यमन, सऊदी अरब और अन्य मुस्लिम देश । इस लड़ाई में इजरायल को सिर्फ अमेरिका का साथ मिला। जिसके बाद कई बार इन मुस्लिम देशों ने अलग-अलग कर इजरायल पर हमला किया लेकिन हर बार उन्हें मुंह की खानी पड़ी।

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जब अचानक हुए हमले से भी नहीं टूटा था इज़राइल बल्कि हमलावर देश को ही दी डाली थी पटकनी

इज़राइल शुरुआत से ही एक शक्तिशाली देश था| यूँ तो इज़राइल के ना जाने कितने दुश्मन हैं लेकिन पिछले 67 सालों में इज़राइल ने 7 से भी ज़्यादा युद्ध में हिस्सा लिया है जिनमे उसने सब में जीत ही हासिल की है| अपनी रंजिश निकालने के लिए एक बार 6 ऑक्टोबर 1973 में इज़राइल पर उस वक़्त हमला कर दिया गया था जब वहां के लोग योम नामक त्यौहार मना रहे थे| हालाँकि इज़राइल इससे टूटा नहीं बल्कि इस हमले का ऐसा पलटवार किया की बदले में मिश्र और सीरिया को ही भारी नुकसान उठाना पड़ा।

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जब अपने खिलाड़ियों की बेवजह मौत का बदला कुछ यूँ लिया था इज़राइल ने 

1972 में म्युनिक में हुए ओलंपिक खेल के दौरान जब फिलिस्तीन के आतंकी संगठन ने स्टेडियम में उतर कर 12 इज़राइली खिलाड़ियों को मौत के घाट उतार दिया था| इस हमले को खेल जगत का सबसे दुर्भाग्यवश हादसा माना जाता है लेकिन अपने खिलाड़ियों की बेवजह मौत का बदला भी इज़राइल ने कुछ यूँ लिया कि दुनिया ने उसे मिसाल माना| हमले के बाद उस वक़्त के इजरायल की प्रधानमंत्री गोल्डा मेयर ने एक-एक कर सभी खिलाड़ियों के घर जाकर उनके परिजनों से वादा किया कि इस वारदात में जो भी व्यक्ति शामिल रहा है उनमें से किसी को भी छोड़ा नहीं जाएगा।

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मोसाद ने ली थी इस हमले का बदला लेने की ज़िम्मेदारी

खिलाड़ियों के साथ क्रूरता करने वालों के साथ हिसाब करने का ज़िम्मा लिया इज़राइल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने| ज़िम्मेदारी मिलते ही मोसाद के सदस्यों ने दुनिया के कोने-कोने से उन आतंकियों को ढूंढकर दर्दनाक तरीके से मौत के घाट उतारना शुरू किया| हालाँकि मोसाद का यह आपरेशन लगभग तीन दशकों तक चला लेकिन मोसाद ने चैन की साँस इस हमले के हर एक आरोपी को देने के बाद ही ली|

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जून 27 1976 को एक बार फिर एक ऐसा मौका आया जब इज़राइल को अपनी सूझबूझ और ताकत दोनों दिखानी थी| तब  तेल अवीव से पेरिस जा रहे इजरायल के एक हवाई जहाज का फलस्तीनी आतंकी संगठन पीएफएफएलएफ के सदस्यों ने अपहरण कर लिया और उसे युगांडा ले गए। युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने आतंकियों को बेगुनाह यात्रियों से भरे जहाज को अपने देश में उतरने की इजाजत दे दी थी अपहरणकर्ताओं ने बंधक बनाए गए लोगों को छोड़ने के बदले में फलस्तीनी आतंकियों की रिहाई की मांग रखी लेकिन इजरायल की सरकार ने इसके बदले में कमांडों कार्रवाई का विकल्प चुना।

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इस अपहरण ने दुनिया के सबसे खतरनाक मिशन को अंजाम दिया

अब इज़राइल को अपने बेगुनाह नागरिकों को भी बचाना था और वो किसी भी कीमत पर आतंकियों की रिहाई पर भी झुकने वाले नहीं थे| ऐसी हालत में इज़राइल ने दुनिया के सबसे खतरनाक मिशन को अंजाम दिया, जिसमें इजरायली कमांडोज और मोसाद के सदस्यों ने युगांडा जैसे देश में जाकर अपने सभी बेकसूर नागरिकों को तो बचाया ही साथ ही सभी अपहरकर्ताओं को भी मार गिराया|

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जब लेबनान के आतंकी संगठन ने किया इज़राइली नागरिकों पर हमला, जिसके जवाब में इज़राइल

अभी मुस्लिम देशो का इज़राइल को समय-समय पर चोट देना ख़त्म नहीं हुआ था| इसी कड़ी में जुड़ते हुए मार्च 1978 में जब लेबनान के एक आतंकी संगठन ने इज़राइल पर हमला करते हुए 35 इज़राइली नागरिकों को मार डाला था जिसका बदला लेने के लिए इज़राइल ने लेबनान पर हमला किया| इस हमले का अंजाम ये हुआ कि लेबनान का आतंकी संगठन पीएलओ तो देश छोड़कर भागा ही साथ ही लेबनान की सरकार को भी इजरायल के सामने गिड़गिड़ाना पड़ा।

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जब 1981 में इज़राइल ने फिर एक बार दुनिया को चौंका दिया था

अबतक सब इज़राइल का लोहा मान चुके थे, लेकिन तभी जून 1981 में इज़राइल ने कुछ ऐसा किया जिसने दुनिया को हैरानी में डाल दिया| तब इजरायल को भनक लग गई थी कि इराक में तानाशाह सद्दाम हुसैन परमाणु हथियारों की खेप तैयार करवा रहा है। इस बड़ी खबर की जानकारी मिलते ही इजरायल ने इसकी जानकारी संयुक्‍त राष्ट्र और अमेरिका को दी। इराक पर दबाव पड़ा तो उसने ऐसी किसी प्लानिंग से साफ इंकार कर दिया लेकिन इजरायल को पक्का विश्वास था कि सद्दाम अपने देश में परमाणु कार्यक्रमों को बढ़ावा दे रहा है। इजरायल ने इसके खात्मे के लिए एक खतरनाक मिशन को अंजाम दिया। जिसके बाद इजरायली सैनिकों ने इराक में घुसकर 8 जून 1981 को सोले परमाणु संयत्र को तबाह कर दिया।

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दुनिया के हर यहूदी को मिलती है इज़राइल की नागरिकता

सुनने में ये थोड़ा अजीब और अविश्वसनीय ज़रूर लग सकता है लेकिन इस बात को जानते और मानते हुए कि इज़राइल दुनिया में यहूदीयों का सबसे बड़ा सरंक्षक बन कर उभरा है ऐसे में  इजरायल सरकार ने व्यवस्‍था कर रखी है कि दुनिया में कहीं भी कोई यहूदी पैदा होता है तो उसे जन्म के साथ ही इजरायल की नागरिकता मिल जाती है। बता दें कि इज़राइल में लगभग 80 प्रतिशत आबादी यहूदीयों की है|

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अगर इज़राइल पर किसी देश ने हमला किया तो हमलावर देश को ही होगा नुकसान क्योंकि…

यहाँ इज़राइल की एक बात जो उसको अन्य सभी देशों से एकदम अलग बनती है वो यह कि इज़राइल दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जो पूरी तरह से एंटी बैलिस्टिक मिसाइल के डिफेन्स सिस्टम से लैस है| एंटी बैलिस्टिक मिसाइल से मतलब हुआ कि अगर दुनिया को कोई भी देश इज़राइल पर हमला करने की सोचता है तो ऐसा करने वाली मिसाइल को इजरायल वापिस उसी देश की ओर मोड़ देता है।

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डिफेन्स में शायद ही इज़राइल का कोई और देश कभी हाथ पकड़ पाए

इजरायल दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जहां प्रत्येक नागरिक को सेना में शामिल होना जरूरी है| यही नहीं इजरायल दुनियाभर के देशों को हथियारों की सप्लाई करता है और इस हाथियार की खासियत होती है कि सबसे उन्नत किस्म के हथियारों का निर्माण इजरायल में ही होता है।