“अगर कोई सिपाही कहता है कि वो मौत से नहीं डरता, तो या तो वो झूठ बोल रहा है, या फिर वो गोरखा है.”

बात जब भारतीय सेना या उनसे जुड़े बयानों की आती है तो एक भारतीय जवान द्वारा कही गयी ये बात शायद हर हिन्दुस्तानी के जहन में सबसे पहले आती होगी. इस बड़े, दिलेर, वज़नदार शब्द को सुनकर यकीनन हर हिन्दुस्तानी के रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इस बात को बड़ी ही आसानी से बोलकर भारत के हिस्से में अपनी तरफ से एक बहुत बड़ा योगदान देने वाले इस भारतीय सैनिक का नाम था सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ.  रौबदार मूंछों वाले इस सैनिक की खासियत जंग के मैदान में दुश्मनों के छक्के छुड़ाना तो थी ही साथ ही एक और बात जिसकी वजह से सैम मानेकशॉ को जाना जाता है तो वो है उनकी हर बात में हाज़िर-जवाबी.

1971 भारत और पाकिस्तान युद्ध

साल 1971 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुआ वो युद्ध भला कौन सा भारतीय भूल सकता है जब भारतीय सेना ने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए पाकिस्तान के 91,000 सैनिकों को बंधक बना लिया था जिसकी वजह से इस युद्ध में पाकिस्तान को भारत से मुंह की खानी पड़ी थी. याद दिला दें इसी जीत के बाद 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान से बांग्लादेश को स्वतंत्र करवाया गया था। यह लड़ाई  कुल 13 दिनों तक चली थी और इस युद्ध की जीत के नायक बने थे फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ.

इंदिरा गाँधी को बोलते थे ‘स्वीटी’ (Sweeti)

कोई इंसान कितना भी हाज़िर-जवाबी क्यों ना हो देश के प्रधानमंत्री से कुछ भी बोलने से पहले वो एक बार ज़रूर सोचेगा लेकिन सैम मानेकशॉ शायद इन सब बातों से परे थे. तभी तो जब भारत-पाकिस्तान के बीच लड़ाई शुरू होने वाली थी उस वक़्त देश की प्रधानमंत्री होने के नाते इंदिरा गाँधी सैम मानेकशॉ के पास पहुँचीं और उन्होंने हालात का जायज़ा लेने के लहजे में मानेकशॉ से पूछा, “सब ठीक तो है ना? लड़ाई के लिए आपकी (भारतीय सेना) की तैयारियां पूरी तो हैं ना?  इंदिरा गाँधी के इस सवाल को सुनकर मानेकशॉ मुस्कुराये और बड़े ही शौर्य अंदाज़ में उन्होंने कहा, “मैं हमेशा ही तैयार रहता हूँ स्वीटी. (I am always ready, Sweeti.)

इंदिरा गाँधी को “मैडम” बोलने से भी कर दिया था मना

ये तो मानेकशॉ का मज़ाकिया अंदाज़ था कि उन्होंने देश कि प्रधानमंत्री को इतने गंभीर मुद्दे के दौरान “स्वीटी” शब्द से संबोधित कर दिया था, लेकिन एक समय ऐसा भी आया था जब सैम मानेकशॉ ने इंदिरा गाँधी को मैडम बोलने से इंकार कर दिया था. उन्होंने इसके पीछे ये तर्क दिया था कि मैडम जैसे शब्द एक “तबके” के लोगों के लिए निर्धारित किये गए हैं. मैं उन्हें प्रधानमंत्री ही बुलाऊंगा.

मानेकशॉ की भारतीय सेना में यूँ तो अलग ही पहचान है लेकिन वो कभी भी इसका हिस्सा नहीं बनना चाहते थे बल्कि…

आज हम मानेकशॉ की बहादुरी के किस्से भले ही सुन रहे हों लेकिन उनकी ज़िन्दगी से जुड़ी एक एहम बात ये थी कि वो कभी भारतीय सेना का हिस्सा नहीं बनना चाहते थे. मानेकशॉ ने हमेशा ही डॉक्टर बनने का सपना देखा और जिया था. हालाँकि जब उनके पिता ने उन्हें डॉक्टर बनने से मना कर दिया तब बगावत के तौर पर उन्होंने भारतीय सेना में दाखिला ले लिया था. भारतीय सेना में उनके साहस के अनगिनत किससे हैं. जिनमे से एक हैं दूसरे विश्वयुद्ध में बतौर कप्तान उनकी तैनाती जहाँ उन्हें बर्मा फ्रंट पर भेजा गया था.

घायल अवस्था में अस्पताल पहुंचे मानेकशॉ तो डॉक्टर को खून बहने का जो कारण बताया उसे सुनकर आपको भी यकीन हो जायेगा कि वो कितने जाबांज थे

इस युद्ध में उन्हें सित्तंग पुल को जापानियों से बचाने की ज़िम्मेदारी दी गयी थी. ज़िम्मेदारी को बखूबी से निभाना जानते थे मानेकशॉ और यहाँ भी उन्होंने वहां बड़ी ही बहादुरी से अपनी कंपनी का नेतृत्व किया. हालाँकि इस लड़ाई में उनके पेट में सात गोलियां लगी थीं जिससे वो गंभीर रूप से घायल हो गए थे. सात गोलियां लगी थीं तो मानेकशॉ को अस्पताल ले जाया गया. खून से लहूलुहान मानेकशॉ को देखकर डॉक्टर ने पूछा, “अरे बहादुर लड़के, ये तुम्हे क्या हुआ?” जिसके जवाब में मानेकशॉ मुस्कुराये और बोले, ” कुछ नहीं डॉक्टर साब, मुझे पेट पर एक खच्चर ने लात मार दी है.”

अब आप खुद सोचिये, दुश्मनों से सात गोलियां खा कर भी अगर कोई इस तरह की हाज़िरजवाबी बनाये रखे तो उसे क्या ही कहेंगें? जी हाँ उन्हें सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ कहा जाये शायद.

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सैम मानेकशॉ के एक कदम से चीन को करना पड़ा था युद्धविराम 

सैम मानेकशॉ की कई उपलब्धियों में एक ये भी है कि जब उनके महज़ एक कदम के आगे झुककर चीन ने युद्धविराम की घोषणा कर डाली थी. दरअसल हुआ ये कि उस वक़्त चीन भारत की पूर्वी सीमा पर दबाव बनाये जा रहा था और किसी की समझ में कुछ नहीं आ रहा था. तब नेहरु ने उस वक़्त कमांडर जनरल बृजमोहन कौल को हटा कर सैम मानेकशॉ की नियुक्ति का फैसला किया. सैम मानेकशॉ को 4 कोर का जनरल ऑफिसर कमांडिंग बनाकर भेजा गया तो उन्होंने चार्ज लेते ही जवानों को अपना पहला ऑर्डर दिया कि था, “जब तक कमांड से ऑर्डर न मिले मैदान ए जंग से कोई भी पीछे नहीं हटेगा और मैं सुनिश्चित करूंगा कि ऐसा कोई आदेश न आए.” बस फिर क्या था उसके बाद चीनी सैनिक एक इंच ज़मीन भी अपने कब्ज़े में नहीं ले पाए और थकहार कर आखिरकार उन्होंने युद्ध विराम का फरमान सुना दिया.

सैम मानेकशॉ द्वारा तख्तापलट की खबर सुनकर बैचैन हो उठी थी इंदिरा और तब सैम मानेकशॉ ने उन्हें…

1971 के भारत-पाकिस्तान की लड़ाई के बीच कहीं से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दिमाग में ये बात बैठ गई कि हो ना हो मानेकशॉ अब आर्मी की मदद से तख्तापलट की कोशिश करने वाले हैं और इस बात को सोच-सोचकर वो बैचैन हो उठीं. जब खुद नहीं रहा गाय अतो इंदिरा गाँधी ने सैम मानेकशॉ को बुलाकर उनसे पूछा कि क्या वाकई में ऐसा है? क्या वाकई में सैम तख्तापलट करने वाले हैं? जिसके जवाब में सैम मानेकशॉ ने कहा:

“क्या आप वाकई में मुझे इतना नाकाबिल समझती हैं कि मैं ये काम (तख्तापलट) भी नहीं कर सकता?तो देखिये प्राइम मिनिस्टर जी, हम दोनों में यूँ तो कई समानताएं हैं. हाँ हम दोनों की नाक लम्बी है पर मेरी नाक शायद आपकी नाक से कुछ ज़्यादा ही लम्बी है, लेकिन हम में ये अंतर है कि मैं किसी के काम में अपनी नाक नहीं घुसेड़ता हूँ.” 

जब अपने कमरे से इंदिरा को बाहर निकलवा दिया था सैम मानेकशॉ ने

प्रधानमंत्री को स्वीटी, डार्लिंग कहना सबके बस की बात नहीं है, ऐसे में हमे ये बताने की ज़रूरत तो नहीं है कि सैम कितने बेबाक थे. लेकिन एक किस्सा ऐसा भी है जब सैम ने इंदिरा गाँधी को अपने कमरे से बाहर निकल जाने का रास्ता दिखा दिया था. दरअसल हुआ यूँ था कि सैम पंडित नेहरु को असम मुद्दे पर ब्रीफिंग दे रहे थे कि तभी इंदिरा धड़-धड़ाते हुए उनके कमरे में घुस आयीं. उनको आते देख सैम ने उनसे कहा, “आप प्लीज रूम से बाहर चली जाइये, अपने अभी गोपनीयता की शपथ नहीं ली है.”

जब पत्रकार ने उनसे पूछा क्या होता अगर सैम मानेकशॉ पाकिस्तानी सेना में होते?

अब इसे सैम मानेकशॉ की बेबाकी ही कहेंगें कि जब उनसे एक पत्रकार ने पूछा कि अगर बंटवारे के समय वो पाकिस्तान चले गए होते और आज पाकिस्तानी सेना में होते तो क्या होता? इस पर भी सैम मानेकशॉ ने बड़ी ही दिलेरी से जवाब दिया कि अगर वो पाकिस्तानी सेना में होते तो 1971 की जंग पर विजय पाकिस्तान की होती.

बताते चलें सैम मानेकशॉ गोरखा रेजीमेंट की कमान संभालने वाले पहले भारतीय सैनिक होने का सम्मान भी अपने नाम दर्ज़ करा चुके हैं.  गोरखा रेजीमेंट में उन्हें सैम बहादुर के नाम से जाना जाता था और उन्हें पद्मविभूषण अलंकरण से सम्मानित भी किया जा चुका है.