सावन सोमवार और ऊपर से अमरनाथ यात्रा. हिन्दुओं की भाषा में या उनकी मान्यता की बात करे तो ये किसी धर्म, और जन्नत से कम नहीं होता. कहते हैं जिसने अमरनाथ की यात्रा कर ली  समझ लो उसने इसी ज़िन्दगी में भगवान शिव को साक्षात ही पा लिया. लेकिन ज़रा सोचिये अगर ऐसी ही किसी यात्रा पर कुछ ऐसा हो जाये की वहां गया इंसान कभी वापिस ही ना आ पाए तो? ऐसा ही कुछ हुआ अमरनाथ यात्रा पर गए कुछ ऐसे श्रद्धालुओं के साथ जो इस यात्रा के बाद अगर अपने साथ अपने घर कुछ लेकर गए हैं तो वो है खौफ, डर, आतंकियों के साथ मुठभेड़ के वो दर्दनाक कुछ पल.

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 इस हमले के बाद अलग-अलग थ्योरी आई सामने 

इस हमले की पहली थ्योरी इस तरह से सामने आई कि इस भयानक हमले को बयां करते हुए इस बस में मौजूद एक यात्री योगेश ने बताया था कि, “हादसा उस वक़्त हुआ जब हम अमरनाथ दर्शन से लौट रहे थे. योगेश ने बताया कि हमारी बस शाम को 5 बजे निकली थी लेकिन दो घंटे के सफर के बाद ही अनंतनाग से लगभग  2 किलोमीटर पहले ही हमारी बस खराब हो गई थी. काफी मशक्कत के बाद हमारी बस जैसे ही चलने को हुई तो बस की खिड़कियों पर ताबड़तोड़ गोलियां बरसने लगीं.

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ड्राईवर सलीम ने बचाई सबकी जान

चश्मदीद ने बताया था कि हमने मौत को उस वक़्त अपने सामने देखा था. बस में मौजूद कई लोगों को गोलियां लगीं थीं, और हमे भी बचने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी लेकिन हमारे बस के ड्राईवर ने हिम्मत नहीं छोड़ी थी. बस ड्राईवर सलीम की ही बहादुरी का अंजाम है कि बस में मौजूद (उन सात के अलावा) सभी लोग जीवित रह पाए. चश्मदीद ने बताया था कि सलीम की बहादुरी का अंदाज़ा कोई भी इस बात से भी लगा सकते हैं कि सलीम बस चला रहे थे और आंतकी बस पर गोलियां बरसाए जा रहे थे. चश्मदीदों ने बताया कि आतंकी तबतक फायरिंग करते रहे जब तक बस मिलिट्री कैंप तक नहीं पहुँच गयी.  कैंप में पहुँचने के बाद सेना ने बस में मौजूद लोगों को  बचाने का काम किया.

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…लेकिन हमले के वक़्त बस चला कौन रहा था हर्ष या सलीम?

हमले के बाद एक बात ये भी सामने आई थी कि हमले के वक़्त बस कौन चला रहा था हर्ष? या सलीम? हीरो तो सलीम बन कर सामने आये लेकिन बस वाकई में कौन चला रहा था ये काफी समय तक रहस्य बना रहा.

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हालाँकि एक गुजरती पेपर में लिखा है कि हमले के वक़्त बस हर्ष चला रहे थे. बता दें कि अमरनाथ यात्री बस पर जब आतंकियों ने हमला किया तो उस वक्त बस हर्ष देसाई चला रहे थे. वही बस के ड्राईवर थे. आतंकियों ने उनपर तीन गोलियां चलाईं लेकिन सामने से आ रही घटना को भाप लिया था इसलिए गोलियां खाने के बावजूद उन्होंने बस नहीं रोकी. एक गुजराती अखबार के मुताबिक़, जब हर्ष देसाई बस चला रहे थे तो आतंकियों ने उन्हें ख़त्म करने की कोशिश की, एक आतंकी ड्राईवर हर्ष देसाई को ख़त्म करने के प्रयास में थे इसलिए उन्होने हर्ष देसाई पर फायरिंग कर दी. फायरिंग में हर्ष देसाई को तीन गोलियां लगीं.

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अब बताया जा रहा कि जब हर्ष की चोट उनकी हिम्मत पर हावी होने लगी तब उनके सहायक ड्राईवर सलीम ने स्टेयरिंग अपने हाथ में ली. लेकिन अभी भी हर्ष हारे नहीं थे सलीम को स्टेयरिंग थमा कर उन्होंने सलीम को बस लगातार चलाते रहने के लिए कहा. सलीम ने हर्ष देसाई की बात मानी और बस को चलाता रहा, उसनें पुलिस चेक पोस्ट पर जाकर बस रोक दी.

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दिलेरी हर्ष की, और हीरो सलीम? 

हमला हुआ था, हर्ष गोलियों से छलनी थे, खून उनके शरीर से लगातार बह रहा था लेकिन उन्होंने अभी भी हिम्मत नहीं हारी थी. समय थक कर या डर कर बैठने वाला नहीं था ये ही सोचकर हर्ष देसाई, सलीम को बस की ड्राइविंग सीट पर बिठाकर गेट की तरफ बढ़े. हर्ष ने देखा एक आतंकी बस में घुसने की कोशिश कर रहा था लेकिन हर्ष देसाई ने उसे धक्का देकर बाहर फेंक दिया. उन्हें पता था कि अगर गलती से भी कोई आतंकी बस में आ जाता तो कोई भी नहीं बच पता. इसलिए ही उन्होंने अपनी जान पर खेलकर और तीन गोलियां खाकर भी 50 लोगों की जान बचाई.

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वाकई में अगर हर्ष देसाई उस रात बहादुरी ना दिखाते और तीन गोलियां खाकर भी बस को ना चलाते रहते तो आज शायद कोई भी जीवित नहीं होता. अब आप खुद ही सोचिये कि आखिर में इस मामले पर दिलेरी किसने दिखाई है और हीरो किसे बनाया जा रहा है और क्यों? पूरे मामले को जानकर तो ये बात शीशे की तरह साफ़ हो गयी है कि मामले में असल में हिम्मत, सूझबूझ तो हर्ष ने दिखाई है तो आखिर मीडिया सिर्फ सलीम को क्यों हीरो बनाने पर तुली है?