वीरप्पन एक ऐसा नाम है जिसे सुनते ही रूह कांप उठती हैं..जी हाँ यह एक ऐसा नाम है जिसका दक्षिण के जंगलों में तीन दशकों तक आतंक था। जो भी उसके रस्ते में आता था वह मारा जाता था..पर एक दिन ऐसा आया जिस दिन वीरप्पन का नामों निशान ही ख़तम हो गया, जी हाँ वो तरीक थी 18 अक्टूबर 2004 की जिस दिन स्पेशल टास्क फोर्स ने कुख्यात डकैत वीरप्पन को मार गिराया था।

हाथी दांत से लेकर चंदन की लकड़ी तक की तस्करी में वीरप्पन की तूती बोलती थी। वीरप्पन को मारना इतना आसान नहीं था, अगर उसके ही साथी नें उसे धोखा न दिया होता| जी हाँ असल में वीरप्पन की उम्र ढल रही थी वो 52 वर्षीय का हो गया था,नज़रें भी कमजोर हो रही थी। जिसकी वजह से वो चाहता था कि उसके लिए अब कोई और काम करे..जो की केवल अच्छे बिजनसमैन ही काम आ सकते थे|

Sandalwood smuggler Veerappan. Express archive photo *** Local Caption *** Sandalwood smuggler Veerappan. Express archive photo

वीरप्पन चाहता था की उसे ऐसा बिजनसमैन मिले जिसके बहारी के देशों से सम्बंध हो..जो की ऐसा हुआ भी वह आदमी वीरप्पन को सारी सूचनयें देता था और साथ ही हथियारों का भी मुहैया कराता था। आपको बता दें की इस आदमी के श्री लंका के कुछ तमिल लड़ाकों से संबंध थे..पर वही बात है की पुलिस से कौन बच पाया है..जैसे ही इस आदमी को उसके श्री लंका के साथ कनेक्शन के बारे में पुलिस नें जब उसे जानकारी दी की उन्हें सब पता है…तो उसके मन का डर उजागर हो गया, जिसके बाद उसने वीरप्पन के खिलाफ स्पेशल टास्क फोर्स का साथ देने का फैसला किया।

जानें पुलिस की गिरफ्त में कैसे आया था यह बिजनसमैन

आपको बता दें की मामला यहीं ख़तम नहीं होता बल्कि कोई और भी वीरप्पन के एनकाउंटर में शामिल था जी हाँ यह आदमी कोई और नहीं है बल्कि एसटीएफ का एक मुखबिर है जो की वीरप्पन के गैंग में शामिल था..ताकि वह पुलिस को सारी खबर दे सके| इसी के चलते मुखबर ने एसटीएफ को बताया की वीरप्पन चाहता था की बिजनसमैन उसके लिए कुछ बंदूकों को इंतजाम करे|

फिर एक दिन ऐसा आया की मुखबिर ने बिजनसमैन को फोन किया और अपना कोड बताया, जिसके बाद बिजनसमैन ने उसे दूसरे शहर के एक गेस्ट हाउस में बुलाया।

दोनों मिले और एक दुसरे का हाल चाल लेते हुए बिजनसमैन ने वीरप्पन की सेहत के बारे में पूछा तो उसने वीरप्पन के बारे में बताते हुए वीरप्पन की चाह बतायी, जिसको सुनते ही बिजनसमैन काम के लिए राजी हो गया। उधर एसटीए खुफिया तरीके से दोनों की बातचीत सुन रही थी जिसमें बिजनसमैन वीरप्पन को अन्ना (बड़ा भाई) कहकर पुकार रहा था।

जैसे ही मुखबिर बाहर निकला एसटीएफ की टीम कमरे में दाखिल हो गयी। उन्होंने व्यापारी को धमकी दी और कहा की अगर वह उनका साथ दे और वीरप्पन को पकड़ने में उनकी मदद करेगा तो वह उसे छोड़ देंगे, नहीं तो श्री लंका उग्रवादियों के साथ उसके संबंधों की बात जगजाहिर कर दी जाएगी। एसटीएफ के ऐसे ऑफर को सुनते ही बिजनसमैन ने दिया वीरप्पन को पकडवाने के लिए फौरन हाँ बोल दी |

जानें कैसे बनाई गयी थी एनकाउंटर की योजना

योजना कुछ ऐसे बनी की बिजनसमैन अपना एक आदमी वीरप्पन के पास भेजेगा जो उसे बताएगा कि बंदूकों की डील श्री लंका में होगी। और जैसा की पता चला है की वीरप्पन को मोतियाबीन था तो उस आदमी नें वीरप्पन को यह भी कहा की मै आपको त्रिची या मदुरै के अस्पताल में ले जाऊँगा जहां आंखों का ऑपरेशन हो जाएगा। जिसके बाद वह वीरप्पन को श्री लंका ले जाया जाएगा। और फिर हथियारों की डील होने के बाद उसे वापस भारत ले आया जायेगा।

आखिर कार वह बिजनसमैन द्वारा भेजा गया आदमी था कौन

एसटीएफ के साथ समझौता होने के बाद बिजनसमैन का कहना था की आखिरकार वह आदमी होगा कौन जो यह सब काम करेगा। बिजनसमैन की चिंता दूर करते हुए एसटीएफ ने उसेऔर बताया की इस काम के लिए एसटीएफ चीफ ने सब-इंस्पेक्टर वेल्लादुरई को चुना। और प्लान के मुताबिक एसटीएफ ने बिजनसमैन से कहा कि वह वीरप्पन के किसी आदमी से धर्मपुरी के नजदीक किसी चाय की दुकान पर मिले। और साथ ही एक लॉटरी टिकट के दो टुकड़े किए एक टुकड़ा बिजनसमैन को दिया और देते हुए कहा कि ‘यह अन्ना का ट्रैवल टिकट’ है, और दूसरा टिकेट उस आदमी के लिए था जो वीरप्पन को आंखों के ऑपरेशन के लिए अस्पताल लेकर जाता| प्लान के मुताबिक सब कुछ ठीक ठाक हुआ और वीरप्पन मारा भी गया|

आपको बता दें की एनकाउंटर की विस्तृत जानकारी के लिए एसटीएफ के चीफ विजय कुमार की आने वाली किताब वीरप्पन: चेजिंग द बिग्रंड में पढ़ा जा सकता है |