बात कश्मीर की आती है तो लोगों के जहन में सबसे पहले “कश्मीरियत”आती है. कश्मीरियत यानी की इंसानियत पर हावी होती एक ऐसी बात जो किसी भी इंसान को इंसान बनने नहीं देती. याद दिला दें तो इसी कश्मीरियत का एक उदाहरण जम्मू में हुए अमरनाथ आतंकी हमले के वक़्त देखने को मिला था. दरअसल एक खबर के मुताबिक जब बस पर आतंकी हमला हुआ था, उस वक़्त जैसे-तैसे खुद को आतंकियों से बचा कर बस थोड़ा आगे निकल आई थी. हालाँकि बस पर उस वक़्त भी रह-रह कर गोलियां लगातार चल रही थी. लोग सीटों के नीचे से सिसकियाँ ले रहे थे. बस कुछ आगे निकली तो लोगों को थोड़ी रौशनी और कुछ दुकाने दिखीं थीं .

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जब इंसानियत पर हावी हो गयी थी कश्मीरियत 

चश्मदीदों ने बताया था कि उस दिन वो दुकानें उनके लिए महज़ दुकान नहीं बल्कि मदद की आखिरी आस थीं. लेकिन ये क्या जैसे ही दुकान के पास लोग पहुंचे उनमे थोड़ी आस जरुर बंधी थी लेकिन बस में से किसी के पास भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो बस से नीचे उतर सके. बस में मौजूद लोगों ने जब बस की खिड़की से झांकते हुए वहां मौजूद लोगों से मदद की गुहार की.

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उन्होंने कहा, ‘प्लीज हमारी मदद करो, हमे आपकी मदद चाहिए.” लोगों को उम्मीद थी कि उन्हें यहाँ मदद मिलेगी लेकिन दुकानदारों ने उनकी मदद करने के बजाय उनपर पर ज़ोर-जोर से हँसना शुरू कर दिया था. ऐसे में कश्मीर से आई एक तस्वीर ने एक बार फिर कश्मीर में इंसानियत की धीरे-धीरे बुझती मशाल को एक बार फिर चिंगारी दी है.

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कश्मीर से आई एक तस्वीर 

कश्मीर में मौका थाह एक स्थानीय कश्मीरी पंडित के अंतिम संस्कार का. जहाँ लोगों ने घटी में हर दिन बढ़ रहे तनाव के बावजूद आपसी सौहार्द की ऐसी मिसाल कायम की है जिसे लोग सालों-साल याद रखेंगे.  बता दें यहाँ एकता का सन्देश देते हुए यहां के पुलवामा जिले में करीब 3000 लोगों ने मिलकर कश्मीरी पंडित तेज किशन का पूरे रीति रिवाज़ से अंतिम संस्कार किया. यहाँ इस अंतिम संस्कार में सबसे ख़ास बात ये थी कि अंतिम संस्कार में शामिल हुए आधे से ज्यादा लोग मुसलमान थे लेकिन हिन्दू-मुसलमान के भेदभाव को टाक पर रख कर यहाँ लोगों ने इंसानियत को तवज्जो देकर ये साबित कर दिया कि कश्मीर पर अभी कश्मीरियत हावी नहीं हो पाई है.

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“ये है असली कश्मीर”

मिली खबर के अनुसार तेज किशन काफी सामी से बीमार चल रहे थे. इसी बीमारी के चलते जब किशन की मौत हो गयी तो सबसे पहले पड़ोसियों ने मस्जिद में जाकर लाउडस्पीकर से इस बात की घोषणा कर आसपास के सभी लोगों को इस मामले की जानकारी दी. इस मामले पर बात करते हुए किशन के भाई जानकी नाथ पंडित ने बताया कि, “जो कुछ भी मेरे भाई के अंतिम संस्कार पर हुआ यही हमारे कश्मीर की असली पहचान है. यही हमारी सभ्यता रही है और हम इसी भाईचारे के बीच रहते आये हैं. अगर कोई भी हममे भेदभाव कर हमे बांटने की बात करेगा तो हम उसपर भरोसा नहीं करेंगें.”

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90 के दशक में किशन के परिवार का वो एक फैसला आज सही साबित हुआ 

स्वर्गीय किशन के बारे में जानने पर पता चलता है कि जब 90 के दशक में पंडित समुदाय के ज्यादातर लोग कश्मीर छोड़कर जा रहे थे उस समय किशन के परिवार ने कहीं और ना जाकर कश्मीर में ही रहने का फैसला किया. वाकई में किशन के अंतिम संस्कार को देखने के बाद यकीन होता है कि किशन के परिवार का वो फैसला गलत भी नहीं था.

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किशन के पड़ोसी से जब किशन के अंतिम संस्कार के बारे में पूछा गया  तो उन्होंने बताया कि, ” किशन की अधिकतर अंतिम संस्कार की रीत मुसलमानों ने ही पूरी की हैं. यहाँ (किशन के आस पड़ोस में रहने वाले लोग) अधिकांश लोग मुसलमान थे. तेज़ किशन के अंतिम संस्कार के समय लकड़ी काटने से लेकर उनको चिता पर लेटाने तक का काम मुसलमानों ने किया. मैंने खुद किशन की चिता के इर्दगिर्द चक्कर लगाने की रस्म भी मैंने पूरी की थी.”

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याद दिला दें तो…

हाल ही में अमरनाथ हमले के बाद जब राजनाथ सिंह ने इस हमल्दे से जुड़ा एक ट्वीट किया था तो उसके जवाब में  शुचि सिंह कालरा जिन्हें ट्रैवलिंग वेबसाइट मेक माय ट्रिप की एडिटर और वेब ब्लॉगर बताया जा रहा था, उन्होंने राजनाथ सिंह की ट्वीट का जवाब देते हुए कहा था  कि, “ऐसे मौके पर कश्मीरियत की चिंता कौन करता है? आपका काम तसल्ली देना नहीं है, इन कायरों (कश्मीरियों) को घसीटकर लाओ और टांग दो।”

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जिसके जवाब में राजनाथ सिंह ने उनकी बोलती बंद करते हुए एक ऐसा जवाब दिया था जो कि अब किशन के अंतिम संस्कार के बादऔर भी पुख्ता हो चला है. राजनाथ सिंह ने  शुचि सिंह कालरा और हर उस इंसान को जवाब दिया था कि, ” “मिस कालरा, मैं निश्चित रूप से कश्मीरियत की चिंता करता हूँ. यह निश्चित तौर पर मेरा काम है कि देश के सभी हिस्सों में शांति स्थापित हो लेकिन मैं आपको बताना चाहूँगा कि सभी कश्मीरी आतंकवादी नहीं होते.”