18 जुलाई को राज्यसभा में मायावती ने अपने रवैये से सनसनी फैला दी, उसी दिन वैंकेया नायडू को उप राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन भी करना था लेकिन मीडिया में सारी सुर्खियाँ मायावती के नाम रहीं. हाथ में अपनी स्पीच के पन्नों को लहराते हुए गुस्से में वो सब बोल गयी वो जो ध्यान खींचने के लिए जरुरी होता है. दरअसल मायावती सहारनपुर में हुए हिंसा पर अपनी बात रख रही थी लेकिन इसके बीच में उन्हें शिकायत हुई कि उन्हें समय कम मिला है और इतने समय में उनकी बात नही हो पायेगी. समय समाप्ति के बाद उन्हें रोका गया तो वो खफा हो गयीं. मायावती का पारा इस कदर चढ़ गया था कि उन्होंने झट से इस्तीफे की धमकी दे डाली और सदन से  बाहर जाने लगीं.

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 मुद्दा दलितों का चल रहा तभी

आपको बता दें कि जब मायावती सदन से बाहर जा रही थी तो उनके आसपास के कई नेताओं ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन वो सदन से ऐसे बाहर गयीं कि जैसे उनका ये कार्यक्रम पहले से तय था. दरअसल अभी बहुजन समाज पार्टी के दिन ठीक नही चल रहे हैं और बसपा सुप्रीमों बौखलाई हुई हैं और इससे निजात पाने के लिए उन्होंने दलितों का मुद्दा उठाया है.

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वाकई पहले से तय था मायावती का ये ड्रामा? 

मायावती का ये इस्तीफ़ा कई मायनों में हैरान करने वाला था. लोगों को समझ नहीं आ रहा था कि क्या वाकई सिर्फ कम समय मिलने की वजह से मायावती ने तैश में आकर इतना बड़ा कदम उठा लिया है या इसके पीछे कोई और कारण है जो जनता समझ नहीं पा रही है. तो हम आपको बता दें कि हाँ दरअसल मायावती का ये ड्रामा एक सोची-समझी रणनीति के तहत उठाया गया है.

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तो इस वजह से दिया है ‘बहनजी’ ने इस्तीफ़ा 

बता दें मायावती के इस अचानक और बेवजह दिए गए इस्तीफे के पीछे कयास ये लगाया जा रहा है कि हो सकता है वो ये सब इस वजह से कर रही हैं क्योंकि इसके पीछे उनका मकसद फूलपुर सीट के लिए लोकसभा उपचुनाव लड़ना हो. याद दिला दें कि  उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य अपनी फूलपुर लोकसभा सीट से जल्द ही इस्तीफा दे देंगे.

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राज्य का उप-मुख्यमंत्री बने रहने के लिए उन्हें विधानसभा या फिर विधान परिषद की सदस्यता हासिल करना अनिवार्य है. यहाँ पर गौर करने वाली बात ये है कि बसपा सुप्रीमो मायावती  फूलपुर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने का मौका यूँ ही तो नहीं जाने दे सकती. सभी बातों पर गौर किया जाये तो मायावती के इस्तीफे का कारण आपको ख़ुद-ब-ख़ुद समझ आ जायेगा.

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इस सीट से कांशी राम भी लड़ चुके हैं चुनाव

याद दिला दें कि सन् 1996 में इसी सीट से कांशी राम ने भी लोकसभा चुनाव लड़ा था. हालांकि वो इस चुनाव में सपा के जंग बहादुर पटेल से लगभग 20,000 वोट से हार भी गए थे. बात करें अगर फूलपुर सीट की तरफ मायावती के झुकाव की तो बता दें कि इस लोकसभा सीट में बड़ा आधार दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़े वर्गों को माना जाता है. ऐसे में हो ना हो मायावती के इस्तीफे की एक बड़ी वजह यहाँ से चुनाव जीत की उम्मीद में लड़ना माना जाना गलत नहीं है.

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गठबंधन के भी हैं कयास 

चुनाव का कयास तो रहा एक कारण. तो वहीँ मायावती के इस चुनाव में लड़ने के पीछे का एक कारण महागढ़बंधन भी हो सकता है. ये कहना गलत नहीं होगा कि अगर मायावती फूलपुर से चुनाव लड़ती हैं और जीतती हैं तो हो सकता है कि 2019 लोकसभा चुनाव में इसे महागठबंधन की तैयारी माना जा सकता है.  बता दें कि सपा, बीएसपी और कांग्रेस लोकसभा का यह उप-चुनाव साथ मिलकर लड़ सकते हैं.

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आसान नहीं होगा मायावती के लिए ये चुनाव जीतना क्योंकि

यहाँ  ये बात गौर करने वाली है कि मायावती बेशक कितने भी तिकड़म क्यों ना फेंकें लेकिन उनके लिए किसी भी हाल में ये जीत आसान नहीं होने वाली है और इसके पीछे का कारण ये है कि  मायावती ने सीधे कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा है. बता दें कि 2007 में राज्य की मुख्यमंत्री बनने पर उन्होंने विधान परिषद् की सदस्यता हासिल की थी. 2012 में उनके राज्यसभा जाने के फैसले के पीछे उनकी विधानसभा हार को माना जाता है. ध्यान रहे कि अगले साल मायावती का कार्यकाल अप्रैल में ख़त्म होने वाला है.