यूपी की राजनीति में कई ऐसे नेता आए जिन्होंने सत्ता में भले ही बहुत कम वक्त बिताया हो लेकिन अपने व्यक्तित्व से उन्होंने हर किसी को प्रभावित किया. ऐसे ही नेता थे रामनरेश यादव. वो गांधीवादी विचारधारा को मानने वाले नेता थे और अपनी ईमानदार छवि के लिए जाने जाते थे.

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उन्होंने वाराणसी हिन्दू विश्वविद्यालय से बीए, एमए और एलएलबी की पढ़ाई की थी और यहीं वो छात्र संघ की राजनीति से भी जुड़े रहे थे. इसके बाद उन्होंने कुछ वक्त वकालत भी की और फिर राजनीति में आए. उन्होंने समाजवादी विचारधारा के तहत बराबरी के मौके, बढ़े नहर रेट, जाति तोड़ो, समान शिक्षा, किसानों की लगान माफी, आमदनी और खर्च की सीमा बांधने, अंग्रेजी हटाओ, जमीन जोतने वालों को उनका अधिकार दिलाना जैसे आंदोलनों को लेकर कई बार गिरफ्तारियां दीं.

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रामनरेश यादव 70 के दशक में किसानों के नेता के तौर पर उभरे थे. उस दौर में वो मुलायम सिंह से बड़े नेता माने जाते थे, और इसी वजह से 1977 में चौधरी चरण सिंह ने मुलायम सिंह यादव को नज़रअंदाज कर रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री बनाया था जबकि मुलायम सिंह लगातार 3 बार विधायक रहे थे. चरण सिंह को रामनरेश यादव से बहुत उम्मीदें थीं लेकिन वो पूरी तरह से उन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाए वो एक ईमानदार और अच्छे शख्स थे लेकिन राजनीति में वो ऐसा कोई ख़ास कमाल नहीं दिखा पाए.

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रामनरेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद जब लोक सभा चुनाव हुए तो जनता पार्टी को कांग्रेस के द्वारा आजमगढ़ से करारी शिकस्त झेलनी पड़ी. कांग्रेस की जीत से जनता पार्टी में भूचाल मच गया. आजमगढ़ की हार के बाद रामनरेश यादव को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा. द लल्लनटॉप वेबसाइट के मुताबिक़ रामनरेश यादव ने जब मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो उसके बाद वो रिक्शे से घर वापस चले गए. रामनरेश यादव लगभग 2 साल तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे थे.

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