मीरा कुमार, कुछ दिनों पहले तक ये नाम रामनाथ कोविंद के साथ-साथ राष्ट्रपति पद की उम्मेदवारी में कंधे-से-कंधा मिलाकर दौड़ रहा था. हालाँकि देश ने अपना राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को चुना लेकिन ये बात तो हर कोई मानेगा कि चुनाव में जीत चाहे रामनाथ कोविंद की होती या मीरा कुमार की देश को एक निपुण राष्ट्रपति ही मिलता. जहाँ एक तरफ भाजपा ने राष्ट्रपति पद के लिए ज़रूरी हर मापदंड पर खरे उतरने वाले रामनाथ कोविंद को मैदान में उतारा था तो वहीँ विपक्ष ने रामनाथ कोविंद को कांटे की टक्कर देने वाली मीरा कुमार को मैदान में उतारा था जो किसी भी मायने में रामनाथ कोविंद से कम नहीं बल्कि बीस ही दिखीं.

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किसी विशिष्ट केटेगरी से नहीं किया मीरा कुमार ने सिविल सर्विसेज में दाखिला

ये बात तो शायद सभी जानते हैं कि मीरा कुमार ने सिविल सर्विसेज़ का एग्जाम दिया है. बताते चलें कि मीरा कुमार 1970  बैच की सिविल सर्विसेज़ परीक्षा में टॉप-10 में रह कर विदेश सेवा में नियुक्त हुई , लेकिन ये बात शायद बहुत कम ही लोगों को पता हो कि मीरा कुमार  ने यूपीएससी परीक्षा में दलित कोटे का विकल्प नहीं चुना बल्कि एक सामान्य कैंडीडेट की हैसियत से ही यह परीक्षा पास की.

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जब एक अधिकारी ने उन्हें घंटो के लिए कमरे में बंद कर दिया था

ये वाकया काफी पुराना है. इस घटना के बारे में बताते हुए विदेश मंत्रालय के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि उस वक़्त उनकी नियुक्ति विदेश मंत्रालय के शाश्त्री भवन में की गयी थी जहाँ वो पहली बार मीरा कुमार से मिले थे. मीरा कुमार की एक खासियत जिनसे अबतक शायद सभी रूबरू हो चुके होंगे वो ये कि उनकी वाणी बहुत ही मधुर है. वो किसी को भी डांटे तो भी ऐसा लगता है कि प्यार से कुछ कह रही हों.

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पूर्व अधिकारी बताते हैं कि उनकी सोच समाजवादी विचारधारा से काफी प्रेरित थी जिससे मीरा कुमार अच्छे से वाकिफ़ हो चुकी थीं. अधिकारी बताते हैं कि नियम के अनुसार उन्हें कहा गया था कि कुछ संवेदनशील कमरों को बंद करके उन्हें चाबियाँ साउथ ब्लॉक स्थित ब्यूरो ऑफ़ सेक्युरिटी में जमा करानी होती थीं. ऐसे में एक दिन क्या होता है कि शाम को अपना काम समेट कर अधिकारी सभी कमरों में चाभी लगाते हैं और चाबियों का गुच्छा लेकर घर निकल जाते हैं और जल्दी-जल्दी में उन्होंने वो कमरा भी बंद कर दिया जिसमे मीरा कुमार मौजूद थीं.

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तीन घंटे बाद कमरा खुला तो मीरा कुमार ने… 

अब जब मीरा कुमार का काम ख़त्म हुआ और वो घर जाने को तैयार हुई तो उन्हें समझ आया कि उनका दरवाज़ा तो पहले से ही बंद है.  आसपास कोई मदद की आस ना दिखती देख मीरा कुमार ने अब  बंद कमरे से ही बाहर मौजूद लोगों को फ़ोन करने चालू किया. काफी समय बाद उन्होंने शास्त्री भवन के सुरक्षाकर्मियों को अधिकारी के घर का पता दिया और चाबियाँ लाने के लिए भेजा.

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अबतक तीन घंटे बीत चुके थे. मीरा कुमार तीन घंटे से एक अधिकारी की गलती की वजह से कमरे में बंद थीं. सबको लग रहा था कि मीरा कुमार गुस्से में आगबबूला होंगी लेकिन कमरा खुलते ही उनका एक नया रूप देखने को मिला. दरअसल कमरा खुलते ही मीरा कुमार ने मजाकिया लहजे में अधिकारी से बोला, ” ये समाजवादी लोग इतने भुलक्कड़ क्यों होते हैं?”

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जब जातिसूचक शब्द सुनकर कर्मचारी को बुलाया अपने कमरे में और फिर..

मीरा कुमार के सौम्य स्वाभाव का अंदाज़ा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि एक बार एक अधिकारी ने उन्हें जातिसूचक शब्द से मीरा कुमार को संबोधित किया था. ये वाकया  उस वक़्त हुआ जब 1982 में विदेश विभाग के एक कर्मचारी ने भाषण के दौरान उनके बारे में जातिसूचक अपशब्द का इस्तेमाल कर दिया. शायद उसने ये सोचा कि मीरा कुमार ने ये बात नहीं सुनी, लेकिन मीरा कुमार ने ये सुन लिया था. अब इस कर्मचारी को ये डर सताने लगा कि उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा.

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…लेकिन आगे कुछ ऐसा हुआ जिसने सभी को हैरान कर दिया. मीरा कुमार ने कुछ समय बाद उस कर्मचारी को अपने कमरे में बुलाया और कहा, “देखिए मैंने सुना कि आपने मेरे खिलाफ कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जो शायद आपको नहीं करना चाहिए था. मैं आपको बता दूं कि आपने मेरे खिलाफ जिस जातिसूचक शब्द का उपयोग किया है उसे अब गाली माना जाता है, लेकिन मैं फिर भी आपसे यही कहूँगी कि आप उम्र में मुझसे बड़े हैं और मैं नहीं चाहती कि हमारे समाज में आप जैसी बड़ी उम्र और अनुभव वाला व्यक्ति ऐसी बातें करे.

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बता दें कि कार्यपालिका और राजनीति का भरपूर सफल अनुभव होने के साथ-साथ मीरा कुमार बहुत अच्छी कवियत्री भी हैं. बीबीसी के एक लेख में छपी एक कविता हम आपसे यहाँ साझा करने जा रहे हैं.

दिशाएं दस हैं,

चार मुख्य, चार कोण और एक आकाश और एक पाताल.

मगर मुझे तो ग्यारहवीं दिशा में जाना है,

जहाँ आस्थाओं के खंडहर न हो.

और बेबसी की राख पर संकल्प लहलहाए