विपक्ष हमेशा पीएम मोदी पर आरोप लगाता रहा है कि मोदी विदेश दौरा ज्यादा करते हैं और देश में कम रहते हैं लेकिन सच मानिये पीएम मोदी ने जिस तरीके से दूसरे देशों के साथ रिश्ते बनाये हैं चाहे वो छोटे देश हों या बड़े, वो रिश्ते अब रंग ला रहे हैं. मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के राष्ट्रप्रमुखों को न्यौता देकर साबित कर दिया था कि अब भारत विश्वगुरु बनने की तरफ अग्रसर हो रहा है.  मोदी के विदेश दौरों का फायदा अब दिखने लगा है. बीते दिनों में अमेरिका ने जिस तरीके से पाकिस्तान को आंतकवादियों का पनाहगाह बताया है और आतंकी सैयद सलाहुद्दीन को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित किया और फिर पाकिस्तान को देने वाले फंड पर रोक लगा दी, उससे तो यही पता चलता है कि पीएम मोदी के विदेश दौरे फायदेमंद साबित हो रहे हैं.

विदेश दौरे के लिए रवाना होते हुए पीएम मोदी- फाइल फोटो

मोदी के विदेशी दौरों का असर

हालांकि चीन के साथ रिश्तों पर नजर डाले तो चीन अपनी हरकतों से बाज नही आ रहा और एशिया में खुद को सबसे आगे साबित करने के चक्कर में पाकिस्तान के सहारे भारत को परेशानी में डालने की कोशिश कर रहा है. डोकलम को लेकर चल रहे सीमा विवाद की बात करें तो दोनों देशों की सेनाएं सीमा पर डटी हुई हैं लेकिन इसी बीच भारत की चिंता कम करते हुए श्रीलंका से एक अच्छी खबर आई है. दरअसल मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद श्रीलंका और भारत के रिश्तों में जिस तरीके से मिठास आई है, वो अब रंग ला रही है.

श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद मोदी

श्रीलंका-चीन को लेकर भारत की चिंता

चीन अपनी घटिया सोच के चलते श्रीलंका में भी हंबनटोटा पोर्ट विकसित करने के नाम पर वहां से हिन्द-महासागर की गतिविधियों पर नजर रखता. जिसके बाद अन्य देशों के साथ-साथ भारत की भी चिंता बढ़ गयी थी क्योंकि जिस तरीके से चीन अपना प्रभुत्व बढ़ाने की कोशिश कर रहा है उसको देखते हुए श्रीलंका में की जा रही उसकी चालाकी भारत के लिए चिंता का विषय थी.

हिन्द महासागर-MAP

श्रीलंका में पोर्ट बनाने के पीछे क्या है चीन की चाल

आपको बता दें कि श्रीलंका का हंबनटोटा पोर्ट दुनिया का सबसे व्यस्त शिपिंग लेन माना जाता है और अब चीन की नजर इसपर है. चीन इस पोर्ट से हिन्द महासागर में अपनी गतिविधियों पर नजर रखना चाहता है. कहा जा रहा है कि चीन की कम्पनी मर्चेंट्स पोर्ट होल्डिंग्स ने श्रीलंका के इस पोर्ट को विकसित करने के लिए करीब 1.5 बिलियन डॉलर मतलब 9 हजार 7 करोड़ रुपये का एग्रीमेंट किया है. इंडस्ट्रियल जोन के विकास के नाम पर चीन यहां 15000 एकड़ की जमीन को अपने अधीन करने की योजना में है. जमीन अधीन करने को लेकर श्रीलंका में विरोध प्रदर्शन भी हुए. माना जा रहा है कि इन सबके पीछे चीन इस पोर्ट के नेटवर्क का प्रयोग अपने युद्ध में इस्तेमाल होने वाले जंगी जहाजों में तेल भरने के लिए भी कर सकता है.

हंबनटोटा पोर्ट, श्रीलंका

श्रीलंका ने चीन को झटका देकर कम की ‘भारत की चिंता’

चीन जिस मंशा के साथ ये पोर्ट विकसित करने में लगा हुआ है उसको देखते हुए  दूसरे देशों ने खासकर भारत की तरफ से चिंता जताई गयी थी कि चीन इस पोर्ट का इस्तेमाल नेवी बेस की तरह कर सकता है. इस पोर्ट की अहमियत को समझते हुए  श्रीलंका में भी इस मामले को लेकर खूब विरोध प्रदर्शन हुए थे. वहां के स्थानीय लोगों ने कहा था कि उन्हें अपनी जमीन खोने का डर है. स्थानीय लोगों के अलावा श्रीलंका के राजनेताओं ने भी जमीन के इतने बड़े टुकड़े को चीन के नियंत्रण में जाते देख इसे देश की संप्रभुता के साथ समझौता बताया.

हंबनटोटा पोर्ट को लेकर विरोध प्रदर्शन करते स्थानीय लोग

चिंता दूर करने के लिए श्रीलंका ने उठाया कदम

आपको बता दें कि इस मामले में अब जो नया समझौता हुआ है उसका अवलोकन करने पर पता चला है कि हंबनटोटा पोर्ट पर वाणिज्यिक परिचालन के बंटवारे के लिए दो कंपनियां बनाई जा रही हैं. जापान, अमेरिका और खासकर भारत की चिंताओं को देखते हुए इस पोर्ट का इस्तेमाल चीन की मिलिटरी उद्देश्यों को पूरा करने के लिए नहीं किया जाएगा. आपको बता दें कि ऐसा करके श्रीलंका ने चीन को एक सीमा के अंदर रोक दिया है और उसे मनमानी करने से भी रोक दिया है.

श्रीलंका के प्रधानमंत्री और चीन के पीएम

श्रीलंका ने सुरक्षा का जिम्मा चीन को न देकर खुद लिया

चीन की कोई चाल कामयाब न हो इसके लिए हंबनटोटा अंतर्राष्ट्रीय पोर्ट ग्रुप सर्विस कंपनी नाम की एक फर्म बनाई जाएगी जिसके पास इस पोर्ट की सिक्यॉरिटी ऑपरेशन का जिम्मा होगा. इस परियोजना में अगर हिस्सेदारी की बात करें तो अब श्रीलंका की हिस्सेदारी 50.7 फीसदी होगी और चीन की 49.3 फीसदी, जिसका मतलब ये हुआ कि सुरक्षा का जिम्मा विशेषकर श्रीलंका के पास ही होगा. ऐसा होने पर भारत की चिंताए कम होगी और चीन की चाल कामयाब नही हो पायेगी.

 

श्रीलंका के राष्ट्रपति, भारतीय PM नरेन्द्र मोदी और श्रीलंका के प्रधानमंत्री

जिस तरीके से चीन अपनी शक्ति दिखाने की कोशिश कर रहा है उसको देखते हुए श्रीलंका का यह फैसला उसे झटका देता है और माना जा रहा है कि पीएम मोदी के विदेशी दौरे और श्रीलंका के साथ भारत के रिश्तों का ही असर है कि चीन के मंसूबों पर यहां भी पानी फिर गया है.