ट्रेन एक ऐसा माध्यम है जो हर आम आदमी के लिए खास है. ट्रेन में हर वर्ग के लोग सफ़र करते हैं, वो चाहे अमीर से अमीर हो या गरीब से गरीब. आये दिन कम से कम लाखों आदमी ट्रेन से सफ़र करता नज़र आता है. उन सब में बस फर्क सिर्फ इतना होता है कि जो गरीब वर्ग के लोग होते हैं वो लोग साधारण डिब्बे में सफ़र करते हैं, और जिनके पास पैसा थोड़ा ज्यादा होता है वो लोग वर्तानुकूल डिब्बे में सफ़र करते हैं.भारत एक ऐसा देश है जहाँ रेलवे के सफ़र से बचा नहीं जा सकता,अक्सर हवाई यात्रा करने वाले अमीर लोगों को भी कभी न कभी रेलवे में सफ़र करना ही पड़ता है. लेकिन वहीँ जहाँ भारतीय रेलवे यातायात का एक अहम हिस्सा है तो वहीँ ये उतना ही अस्त-व्यस्त भी है.

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जी हाँ पिछले कई दिनों से भारतीय रेलवे इस बात से सुर्ख़ियों में थी कि ट्रेन और स्टेशन पर मिलने वाला खाना खाने लायक नहीं होता.ट्रेन में ऐसा खाना मिलता है जिसे खाने से इंसान अक्सर बीमार ही पड़ता है. आपको बता दें कि यह मामला जनता के सामने तब उभर कर आया जब CAG मानें नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने संसद में अपनी एक रिपोर्ट पेश की और उसमें ये शिकायत दर्ज थी.

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CAG की इस पेशकश के बाद भारतीय रेलवे में काफ़ी खलबली मच गई थी और उस खराब छवी को सुधारने के लिए काफ़ी कड़े कदम उठाए जानें लगे ताकि जनता को कोई शिकायत न हो. रेलवे तो इतना ज्यादा सतर्क हो गया था कि यहाँ तक की रेलवे मिनिस्टर सुरेश प्रभु ने कोई भी परेशानी की बात को खुद तक डायरेक्ट बताने का माध्यम भी ढूंढ निकला था कि जिसको भी कोई रेलवे से सम्बंधित परेशानी हो वे लोग ट्वीटर के ज़रिए हम तक पहुच सकते हैं जिसपर कार्यवाई भी की जाएगी.

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अभी तक जिस CAG ने रेलवे के खाने पर रिपोर्ट दर्ज कर रेलवे का पर्दाफाश किया था. आज उसी CAG ने रेलवे का एक और पर्दाफाश किया है. जी हाँ इस बार CAG ने ट्रेन में इस्तेमाल होने वाले कंबल और चादरों के न धुले जाने पर रिपोर्ट बनाई है. CAG ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कंबल और चादरों के धुलने में रेलवे भयंकर लापरवाही करता है.

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आपको बता दें कि संसद में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में CAG ने खुले शब्दों में कहा है कि रेलवे अपनी इन महेत्वपूर्ण चीज़ों की धुलाई के लिए दिए गए निर्धारित शेड्यूल को बिल्कुल भी फॉलो नहीं कर रहा है. रेलवे का तो इतना बुरा हाल है कि कई जगह तो 3 सालों से कम्बल, चादर और तकिये के कवर्स धुले तक नहीं है.

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CAG ने बताया है कि उन्होंने जो भी डाटा कलेक्ट किया है उससे यह साफ़ हुआ है कि साफ़-सफाई के मामले में रेलवे ने पूरी तरह उदासीनता ही हांसिल की है. CAG ने बताया है कि 9 अलग-अलग ज़ोन के अंदर पड़ने वाले 13 डिपो में, 3 साल से कोई कंबल नहीं धुला गया है. सोच कर ही घिन आती है कि जिस कम्बल को रोज़ अलग अलग लोग इस्तेमाल करते हैं, उस कम्बल को रेलवे ने 3 साल से नहीं धुला गया है.

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ऑडिट के दौरान तो यह भी बात सामने आई है कि 33 में से सिर्फ 7 डिपो को अगर छोड़ दिया दिए जाएं तो उनमें चादरें भी बिना धुली पाई जाती है. ये डिपो कोई छोटे-मोटे शहर के नहीं हैं, बल्कि मुंबई, कोलकाता, ग्वालियर, गुवाहाटी, लखनऊ, सिकंदराबाद और डिब्रूगढ़ जैसी जगहों की हैं. अब इस बात से आप खुद ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि बीमारियों को न्यौता देने का इससे बेहतर अवसर क्या होगा.

रेलवे का नियम क्या कहता है?

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नियमों की अगर बात करें तो गाइड लाइन के अनुसार तकियों के कवर्स, चादरें, तौलिए आदि जैसे ही एक बार इस्तेमाल होते है तो उन्हें फ़ौरन धोने के लिए भेज दिया जाना चाहिए. कंबल हर 2 महीने बाद धुल जानें चाहिए. लेकिन इतनी हिदायत के बाद भी इसका पालन बिल्कुल भी नहीं हुआ.