याद कीजिये 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों को, जिसमें बीजेपी को करारी हार मिली थी, करारी इसलिए क्योंकि जिस वक्त ये चुनाव हुआ उस वक्त माना जा रहा था कि मोदी लहर चल रही है और इस लहर के सहारे बीजेपी बिहार में भी अपनी नैय्या पार लगाना चाह रही थी लेकिन उसके सपनों को महागठबंधन नामक तूफान ने तोड़ दिया और हाल ये हुआ कि बीजेपी बिहार में सरकार नही बना पाई. उस दिन से बीजेपी ने अपने प्लान को चेंज किया और माना जा रहा है 26 जुलाई को जो भी कुछ हुआ सब उसी प्लान का हिस्सा है. आईये आपको बताते हैं कि आखिर बीजेपी का क्या प्लान था और क्यों 27 जुलाई को ही शपथ लिया गया.

बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार

बीजेपी का प्लान हुआ कामयाब

सबसे अहम बात ये है कि बीजेपी ने आगामी लोकसभा चुनाव को देखते  हुए यूपी और बिहार में पकड़ मजबूत बनाने की रणनीति बनाई और इसके लिए यूपी में सफलता तो मिल गयी लेकिन बिहार में दिक्कतें आ रही थीं. जहां नीतीश कुमार ‘सुशासन बाबू’ के नाम पर सरकार में फिर से लौटे थे तो वहीं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे और जमानत पर बाहर घूम रहे लालू प्रसाद यादव को जनता ने फिर से मौका दे दिया था. बीजेपी ने बिहार विधानसभा चुनाव के बाद अपनी नयी रणनीति के तहत नीतीश पर हमले करने कम कर दिए, क्योंकि नीतीश कुमार की पार्टी पहले भी NDA में सहयोगी रह चुकी थी, इसलिए बीजेपी के प्लान के अनुसार नीतीश कुमार को फिर से NDA सहयोगी बनाया जा सकता था लेकिन लालू को नही और इसलिए ही बीजेपी ने लालू पर हमले तेज कर दिए.

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चाल एकदम सटीक चली

भ्रष्टाचार से सने लालू यादव पर आरोप पर आरोप लगते जा रहे थे और इस बार तो उनके बेटे और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी भ्रष्टाचार में घिर चुके थे, ताबड़तोड़ सीबीआई के रेड पड़ रही थी और बिहार की राजनीति में भूचाल उठ रहा था. लालू और उनके परिवार के कारनामों के छीटें नीतीश कुमार पर भी पड़ रहे थे और उनकी छवि को नुकसान हो रहा है. नीतीश कुमार लालू के ऊपर हो रही कार्रवाई से तंग आ चुके थे और उन्हें जवाब देना मुश्किल हो रहा था. बेदाग छवि वाले नीतीश कुमार लालू के सहयोगी के रूप में खुद को बर्दाश्त नही कर पा रहे थे और 26 जुलाई की शाम तक अपना इस्तीफा राज्यपाल केसरीनाथ त्रिपाठी को सौंप दिया. बीजेपी की सारी चाल बिल्कुल सटीक जा रही थी. नीतीश के इस्तीफा देते ही बीजेपी ने तुरंत समर्थन दे दिया और वो भी बिना किसी शर्त के.

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27 जुलाई को पहले से ही तय था नीतीश कुमार का शपथ

जिस तरीके से बीजेपी और जदयू की अंदर ही अंदर खिचड़ी पक रही थी उसको देखते हुए 26 जुलाई की शाम को बिहार में जो भी हुआ वो सब पहले से तय लग रहा था. जदयू और बीजेपी को पहले से ही पता था कि 27 जुलाई को लालू पटना से रांची जाने वाले हैं चारा घोटाले में पेशी के लिए, और 26 जुलाई की शाम को नीतीश ने इस्तीफा राज्यपाल को सौंप दिया. यहां चाल ये थी कि जब नीतीश कुमार इस्तीफा देकर दोबारा मुख्यमंत्री की शपथ लें तो लालू बिहार में न रहें, क्योंकि लालू प्रसाद यादव पटना में होते तो जरूर कोई जोड़-तोड़ करते या फिर हो सकता था कि कोई रुकावट जरूर डालते. इसलिए आनन-फानन में नीतीश कुमार ने इस्तीफा भी दिया और बीजेपी ने समर्थन भी दिया और अगले ही दिन सुबह 10 बजे ही शपथ भी ले लिया.  इस बारे में राहुल गांधी ने कहा कि “मुझे सब पता था, और बीजेपी और जदयू के बीच खिचड़ी करीब 4 महीने से पक रही थी”

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आपको बता दें कि जिस वक्त नीतीश कुमार शपथ ले रहे थे उसी वक्त लालू पेशी के लिए रांची के लिए रास्ते में थे. कहा तो ये भी जा रहा है कि लालू प्रसाद यादव पहले बुधवार शाम को ही फ्लाइट से रांची पेशी के लिए जाने वाले थे लेकिन बिहार में हुई राजनीतिक उठापटक के कारण उन्होंने अपना टिकट कैंसिल करवाया और अगले दिन सड़क के रास्ते से रांची गये. हालांकि बिहार में अब जदयू और भाजपा की गठजोड़ की सरकार है लेकिन इस बदलाव के बाद लालू और उनका परिवार नीतीश कुमार और बीजेपी पर आरोप लगाना शुरू कर दिया है.