1977 की एक सर्द सुबह को इंदिरा गांधी ने फैसला लिया कि अब भारत में आम चुनाव होने चाहिए. उन्होंने ये आम चुनाव कराने से पहले कहा कि, लगभग 18 महीने पहले तक हमारा देश विनाश की कगार पर था. उन्होंने आपातकाल पर सफाई देते हुए कहा कि, आपातकाल इस वजह से लगाया गया था कि जनजीवन वापस पटरी पर आ सके उनका मानना था कि आपातकाल लगने से पहले जनजीवन पटरी से उतर चुका था. अब हालात सामान्य हो चुके हैं तो अब आम चुनाव होने चाहिए.

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एक तरफ इंदिरा गांधी रेडियो पर देश को संबोधित कर रही थीं और दूसरी तरफ उनके विरोधी जेलों से रिहा करवाए जा रहे थे. 19 जनवरी को मोरारजी देसाई के दिल्ली स्थित घर पर चार दलों के नेताओं की मीटिंग हुई.

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ये पार्टियां थी, जनसंघ, भारतीय लोकदल (चरण सिंह के नेतृत्व में बनी किसानों की पार्टी), सोशलिस्ट पार्टी और मोरारजी देसाई की पार्टी कांग्रेस(ओ). इस मीटिंग के बाद देसाई ने ऐलान कर दिया कि ये सारे दल एक ही चुनाव चिन्ह और एक ही पार्टी के झंडे तले चुनाव लड़ेंगे. 23 जनवरी के दिन जयप्रकाश नारायण ने एक प्रेस कांफ्रेस में जनता पार्टी की घोषणा कर दी.

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इंदिरा गांधी को संकेत मिल गया था कि इस बार के चुनाव आसान नहीं होंगे, उनको सबसे बड़ा धक्का तब लगा जब जगजीवन राम जो कि नेहरू के समय में अहम पदों पर रह चुके थे और जिन्होंने इंदिरा की कैबिनेट में भी अहम ओहदा संभाला था और अब तक जो पूर्ण रूप से कांग्रेसी थे. उन्होंने ऐलान कर दिया कि वो अब केंद्रीय मंत्रीमंडल छोड़ रहे हैं.

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वो अनुसूचित जातियों के दिग्गज नेता थे. मज़े की बात ये थी कि उन्होंने ही आपातकाल के पक्ष में प्रस्ताव रखा था. उनका इस्तीफ़ा कांग्रेस के लिए एक बड़े धक्के की तरह था. जगजीवन राम को काफी तेज-तर्रार नेता के रूप में जाना जाता था.

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उनके कांग्रेस छोड़ देने से कांग्रेस के जहाज में एक बड़ा छेद हो गया. इसके बाद जगजीवन राम ने एक नई पार्टी का गठन कर दिया जिसका नाम उन्होंने कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी (सीएफडी) रखा. उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी जनता पार्टी से तालमेल करेगी.

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मार्च के महीने में चुनाव कराना तय हुआ. विपक्षी पार्टियों ने रामलीला मैदान में एक विशाल रैली के आयोजन कर चुनाव अभियान के श्रीगणेश करने की तैयारी की. इस रैली को लेकर इंदिरा सरकार बौखला गई वो किसी भी हालत में इस रैली को नाकामयाब करना चाहती थीं. अब इंदिरा गांधी को हार का डर सताने लगा था.

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उन्होंने इस रैली को कामयाब न होने देने के लिए हर संभव दांव चला. उन्होंने रैली में लोगों को न जाने देने के लिए उस वक्त की एक हिट रोमांटिक फिल्म बॉबी का प्रसारण सरकारी टेलीविजन पर करवा दिया. उस वक्त तक एक ही टीवी चैनल हुआ करता था जो सरकार के नियंत्रण में होता था.

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इंदिरा ने ऐसा कदम इसलिए उठाया कि सामान्य दिनों में दिल्ली की जनता टीवी स्क्रीन पर चिपकी रहती थी, लेकिन इंदिरा का ये प्रयास सफल नहीं हो पाया. एक अखबार ने छापा कि, बाबूजी (जगजीवन राम) बॉबी पर भारी पड़ गए.

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जगजीवन राम और जयप्रकाश नारायण को सुनने के लिए रामलीला मैदान में लगभग दस लाख लोग जमा हुए. रैली को असफल बनाने के इंदिरा के सारे प्रयास असफल हो गए. इस रैली में विपक्ष के भी कई नेताओं ने भाग लिया था. इन आम चुनावों के बाद इंदिरा गांधी की हार हुई थी.