डोकलाम विवाद 

भारत और चीन के डोका ला में तनातनी बढती जा रही है. चीन हर बार 1962 के युद्ध की तरह धमकी दे रहा है. पिछले एक महीने से यह विवाद चल रहा है दोनों देश की सेना का सीमा पर जमावाड़ा लगा हुआ है. चीन भारत को लाख गीदड़ भरी धमकियां दे रहा है. सिक्किम, भूटान और भारत की त्रिकोणीय सीमा मिलती है वहां चीन अपनी सड़क बनाने के लिये सीमा में घुसना चाह रहा था.

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भारतीय जवानों ने चीनी सैनिकों को खदेड़ा 

डोकलाम विवाद चीन अपनी घटिया हरकतों से बाज नहीं आ रहा है. डोकलाम के बाद लद्दाख इलाके की पैंगॉन्ग झील के उत्तरी किनारे चीनी सैनिकों ने भारत की सीमा में घुसपैठ करने की कोशिश की है. जिसके बाद सीमा पर मुस्तैद हमारे भारतीय जवानों ने न सिर्फ चीनी सैनिकों की घुसपैठ को नाकाम किया बल्कि उन्हें वापस चीनी सीमा तक खदेड़ा.

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पूरा मामला 

ख़बरों के अनुसार बताया जा रहा है घुसपैठ की कोशिश नाकाम होते देख चीनी सैनिकों ने भारतीय जवानों पर पत्थरबाजी शुरू कर दी. भारतीय सैनिकों ने पत्थरबाजी का मुहतोड़ जवाब दिया. बता दें कि इस घटना में दोनों तरफ के सैनिकों के घायल होने की खबर बतायी जा रही है. दोनों तरफ से 2-2 सैनिक घायल हुए हैं. आपको बता दें दोनों देश के बीच ये टकराव 30 मिनट तक चला. डोकलाम के बाद अब चीनी सैनिकों ने लद्दाख में घुसपैठ करना चाहा है.

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अधिकारियों के मुताबिक पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) के सैनिक दो इलाकों फिंगर फोर और फिंगर फाइव में मंगलवार सुबह 6 से 9 के समय भारतीय सीमा में घुसने की कोशिश कर रहे थे. बता दें कि दोनों ही जगह भारतीय जवानों ने चीनी सैनिकों की कोशिश को नाकाम कर दिया. बता दें कि फिंगर फोर इलाके में चीनी सैनिक घुसने में कामयाब हो गए थे, लेकिन भारतीय जवानों ने उन्हें वापस चीनी सीमा में खदेड़ दिया.

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लद्दाख का इतिहास 

चीन की सेना के पीएलए के प्रवक्ता ने भारत को 1962 के युद्ध की हार की याद दिलाते हुए कहा कि भारतीय सेना युद्ध करने को ज्यादा बेचेन न हो. चीन बार-बार यही धमकी दे रहा है कि इस बार हालात 1962 से भी बुरे होंगे यह सब बोलने से पहले चीन को लद्दाख का इतिहास देख लेना चाहिए. लद्दाख इलाके में हमारे कुछ भारतीय सैनिकों ने 1700 चीनियों को मौत के घाट उतार दिया था. तब के समय भारतीय राजनीतिक नेतृत्व की कमजोरी के कारण हमे अपनी हजारों वर्ग किलोमीटर जगह खोनी पड़ी थी. लेकिन अब हालात बिलकुल उलट हैं.

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जानिये क्या हुआ था 1962 में

चीन को यह समझ लेना चाहिए कि अब हमारे भारतीय सैनिकों के होसले उतने ही बुलंद हैं जितने पहले थे तथा साथ में संसाधन के मामले में भी हम पीछे नहीं हैं. अगर चीन ने अब गलती से भी युद्ध के बारे में सोचा तो भारत चीन को मुहतोड़ जवाब के साथ मुह दिखाने लायक नहीं छोड़ेगा. 1962 का समय भारत के लिये बेहद चुनौती पूर्ण था. चीनी सैनिक हिंदी-चीनी सैनिक भाई-भाई का नारा लगाते हुए भारतीय सेना में प्रवेश कर गये थे. देखते-देखते चीन ने पं नेहरु के पंचशील सिद्धांतों को भूलते हुए भारत के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी थी.

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1962 के समय मेजर शैतान सिंह की बहादुरी की कहानी

उस समय की लड़ाई के वैसे तो भारतीय सेना के कई किस्से मशहूर हैं. लेकिन मेजर शैतान सिंह और उनकी कम्पनी सी ने 1962 के समय में भारतीय सेना की बहादुरी को लेकर एक मिशाल कायम कर दी. लद्दाख की ऊँची बर्फीली पहाड़ियों के चूशुल में मेजर शैतान सिंह अपनी कम्पनी को लीड कर रहे थे. चीनी सेना को मुख्यतौर पर आर्टीलरी सहायता मिल रही थी. रात भर चार्ली कम्पनी पर भारी गोलीबारी के बाद उम्मीद के मुताबिक अगले दिन चीन के 2000 से अधिक सैनिक सुखी नदी के तल से जैसे ही खुले में आये वैसे ही मेजर शैतान सिंह की हैवीमशीन गनों ने अपना काम शुरू कर दिया. 20 चीनी सैनिकों के मुकाबले 1 भारतीय सैनिक था लेकिन मेजर शैतान सिंह ने जवानों का होसला नहीं टूटने दिया. इस भीषण लड़ाई में बुरी तरह जख्मी होने के बाद मेजर चीनी जवानों पर टूट पड़े थे.लड़ाई में गोलियां खत्म होने के बाद भी जवान चीनी सैनिकों पर खाली हाथ टूट पड़े थे. इस जंग में हमारे भारतीय जवान दुश्मनों पर मौत बनकर टूटे थे !

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