भारत की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने जब तीन तलाक पर फैसला सुनाया तो मौलवी और मौलानाओं को सांप सूंघ गया. वही दूसरी तरफ महिलायें जीत का जश्न मनाने लगीं. महिलायें मिठाई बाँट कर ख़ुशी का इजहार करती नजर आई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत कई नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट के फैलसे का स्वागत किया. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की पीठ ने 3:2 की बहुमत से पीड़ित महिलाओं के पक्ष में फैसला सुनाया. लेकिन यह फैसला  महिलाओं और सरकार के पक्ष में आने से मुस्लिम महिलाएं प्रधानमंत्री को खुला ख़त लिखकर एक और कुप्रथा को बंद करने की मांग की है.

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तीन तलाक पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब मुस्लिम महिआलों ने प्रधनामंत्री को खुला ख़त लिखकर खतना नाम की कुप्रथा को बंद करने की मांग की है. इसी कड़ी में मासूमा रानाल्वी ने पीएम के नाम एक खुला खत लिखकर इस कुप्रथा को रोकने की मांग की है. आपको बता दें कि मासूमा बोहरा समाज से है. तीन तलाक के बाद अब प्रधनामंत्री से खतना पर भी रोक लगाने की मांग की है.

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प्रधानमंत्री को लिखे खत में मासूमा लिखती हैं  कि स्वतंत्रता दिवस पर आपने मुस्लिम महिलाओं के दुखों और कष्टों पर बात की थी. ट्रिपल तलाक को जब आपने महिला विरोधी कहा था यह सुनकर बहुत अच्छा लगा था.आपको बता दें कि प्रधानमंत्री ने लालकिले से अपने भाषण के दौरान महिलाओं पर अत्यचार ख़त्म करने की बात कही थी. हमारे समाज की हकीकत यही है कि महिलाओं पर प्रथा और परम्परा के नाम पर कुछ कुप्रथा जबरदस्ती थोप दिए जाते है.

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मासूमा ने आगे कहा कि औरतों को तब तक पूरी तरह से आज़ादी नहीं मिल सकती जब तक हमारा बलात्कार होता रहेगा, हमें संस्कृति, परंपरा और धर्म के नाम पर प्रताड़ित किया जाता रहेगा. तीन तलाक तो अन्याय था लेकिन मै आपको खतने के बारे में बताती हूँ जो छोटी बच्चियों के साथ किया जाता है.

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मासूमा ख़त के जरिये प्रधानमंत्री का ध्यान इस कुप्रथा की तरफ खीचना चाहती हैं और उन्हें बताना चाहती कि खतना कितना भयानक और दर्दनाक होता है और खतना किया भी सिर्फ इसलिए जाता है ताकि महिलायें और बच्चियां अपने यौनइच्छा को दबा कर रख सकें.

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मासूमा रानाल्वी ने ख़त में लिखा कि जैसे कोई बच्ची सात साल की होती है उसकी दादी या माँ उसे किसी दाई या लोकल डॉक्टर के पास ले जाती है और वहां उसके प्राइवेट अंगो को काट दिया जाता है. उसे यह भी नही बताया जाता है कि उसे कहा ले जाया जा रहा है और उसके साथ क्या होने वाला है?इस प्रथा का दर्द ताउम्र के लिए उस बच्ची के साथ रह जाता है

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मासूमा के मुताबिक खतना महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले भेदभाव का सबसे बड़ा उदाहरण है और यह उनके मानवाधिकार का भी हनन है. खतना जैसी कुप्रथा से उनके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है.कई सालों से इस कुप्रथा का शान्ति से पालन किया जा रहा है. सब इस कुप्रथा को झेल रहे है. बोहरा समुदाय के अलावा बहुत कम लोग इस कुप्रथा के बारे में जानते होंगे.

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उन्होने आगे कहा कि हमने इस कुप्रथा के खिलाफ आवाज़ उठाने की ठानी और हमने एक ‘WeSpeakOut On FGM’ नाम से एक कैंपेन शुरू किया. जिसमें हमने एकजूट होकर इस दर्द को एक दुसरे से साझा किया.हमने अपने पादरी, सैदना मुफ़्फदल को इस प्रथा को रोकने के लिए कई ख़त लिखे, पर हमारी बात किसी ने नहीं सुनी.

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यह प्रथा आज भी चल रही है और पादरी साहब ने एक स्टेटमेंट जारी करके कह दिया कि खतना 1400 से चली आ रही प्रथा है इसे बदला नही जा सकता है. आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 8 दिसंबर 2014 में यूएन महासभा ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसके तहत पूरी दुनिया में खतने को बैन करने की बात कही गई.प्रधानमंत्री जी एक बार पहले भी आपने कहा था कि संविधान के अनुसार, मुस्लिम औरतों और उनके अधिकारों की रक्षा करना अनिवार्य है.