हिंदुस्तान का अभिन्न अंग कश्मीर, और वहां से निकाले गये कश्मीरी पंडित इस देश में हमेशा अलग नजरों से देखे जाते हैं. जहां कश्मीर में शांति बहाली के लिए मोदी सरकार हरसंभव प्रयत्न कर रही है वहीं कश्मीर से विस्थापित कश्मीरी पंडितों की वापसी का भी मुद्दा बेहद अहम है. ऐसा नही है कि कश्मीर में रहने वाला हर मुस्लिम हिन्दुओं की जान का प्यासा है और फिर उनके पुनर्वास के खिलाफ है. कई मुस्लिम ऐसे भी हैं जिन्होंने समय-समय पर कुछ ऐसी मिसाल पेश की है जिससे लगता है कि घाटी में अभी इंसानियत जिंदा है.

शरणार्थी कैम्प में कश्मीरी पंडित

अनंतनाग की घाटी से हम एक ऐसी खबर लाये हैं जो हर किसी के दिल को छू जाएगी. हर वो इंसान जो कश्मीरी पंडितों को वापस कश्मीर में देखना चाहता है, उसके लिए ये खबर एक अच्छा उदाहरण है. बता दें कि आतंकियों की धमकियों से 1990 में कश्मीर में आये भूचाल के बाद कई कश्मीरी पंडित अपना घर छोड़ चुके थे, उनमें से त्रिलोकी नाथ शर्मा भी एक थे. पिछले दो साल से लकवे की बीमारी जूझ रहे त्रिलोकी नाथ शर्मा (75 वर्ष) की मृत्यु 27 अक्टूबर को हो गयी. शर्मा, घाटी में वापस लौटने वालों में से एक थे. इनके बारे में बताया जा रहा है कि इलाके में एक शिक्षक के रूप में पहचान बना चुके थे. जिस क्षेत्र में त्रिलोकी नाथ शर्मा रहते थे वो मुस्लिम बाहुल्य था लेकिन इनकी मृत्यु के बाद इनके आसपास के मुस्लिमों ने जो किया वो खुद में एक मिसाल है.

अंतिम संस्कार में शामिल मुस्लिम समुदाय के लोग

 

जनसत्ता की खबर के अनुसार अनंतनाग का वानपोह गांव उस वक्त इंसानियत की मिसाल बन गया जब एक कश्मीरी पंडित के अंतिम संस्कार में कई मुस्लिमों ने मदद की. त्रिलोकी नाथ किसी समय यहां से विस्थापित हो चुके थे लेकिन जब वो कश्मीर वापस लौटे तो उन्हें वहां के मुस्लिमों ने अपने दिल में जगह दी. इतना ही नही वो शिक्षक थे और हर कोई उनका सम्मान करता था. पंडित त्रिलोकी अपनी पत्नी शारिका देवी, दो बेटे (राकेश और बंतू) और बेटी बिंती के साथ रहते थे. ये मसला इसलिए भी खास है क्योंकि कश्मीर में नापाक इरादे रखने वालों ने जिस तरीके के हालात बना रखे हैं, उसको देखते हुए ये राहत की खबर है. अलग-अलग धर्मों से होने के बाद भी जैसी सौहार्दता देखने को मिली, वो काबिल-ए-तारीफ है.

अंतिम संस्कार में शामिल लोग

बता दें कि त्रिलोकी नाथ शर्मा की मृत्यु के बाद मुस्लिम समुदाय ने हिंदू अनुष्ठानों के अनुसार मृतक शर्मा का अंतिम संस्कार कराने में काफी मदद की. इस मौके पर यहां के विधायक अब्दुल माजिद लर्मी और राज्य के पूर्व मंत्री अब्दुल गफ्फार सोफी भी मौजूद थे. इस घटना के बाद वहां के स्थानीय लोगों ने कहा कि ‘जो घाटी में तनाव फैलाना चाहते हैं उनके लिए ये सन्देश है कि हम सभी एकसाथ मिलकर रहते हैं.’

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घाटी के हालात ठीक करने के लिए मोदी सरकार ने भी अपने रुख में बदलाव किया है और बातचीत की शुरुआत के लिए आईबी के पूर्व डायरेक्टर दिनेश्वर शर्मा को प्रमुख बनाया है. हालाँकि देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह पहले भी कह चुके हैं कि “जम्मू-कश्मीर में निरंतर वार्ता प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए, कश्मीर के युवाओं की जो भी वैध अकांक्षाएं हैं उनको हल करने का पूरा प्रयास रहेगा. जो भी करेंगे साफ इरादे से करेंगे.”