बात जब गुजरात दंगो की आती है तो यकीनन ज़ेहन में कई चीजें आती होंगी, लेकिन इनमें से सबसे पहले जो बात दिल-ओ-दिमाग में आती है वो है एक तस्वीर, तस्वीर एक युवक की, जिनका नाम बताया जाता है अशोक परमार. हाथ में लोहे ही सरिया, और दूसरा हाथ हवा में, चेहरे पर आक्रोश, दाढ़ी से ढका हुआ चेहरा. यकीन मानिये कुछ दिनों के लिए अशोक परमार गुजरात दंगों का चेहरा बन चुके थे. ध्यान दीजियेगा अशोक के सर पर बंधे हुए उस केसरिया पट्टी पर भी जिसके चलते उन्होंने लोगों के दिमाग में अलग ही “खौफ” वाली जगह बना ली थी, लेकिन इसे एक विडंबना ही कहेंगें कि जिसे गुजरात दंगों का चेहरा माना गया था दरअसल उसका तो गुजरात दंगों से दूर-दूर तक कोई लेना देना ही नहीं था.

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अशोक परमार की सच्चाई जानेंगें तो शायद यकीन ना हो..   

जानकारी के लिए बता दें कि अशोक परमार की ये तस्वीर शाहपुर में उस वक़्त एक कैमरे में क़ैद की गयी थी जब गोधरा में दंगे अपने पूरे चरम पर थे. अशोक की ये तस्वीर उस वक़्त की सुर्ख़ियों में आ गयी थी, मुस्लिम समुदाय को उनसे एक अलग ही तरह की नफरत हो गयी थी लेकिन इसकी सच्चाई? उस दिन की सच्चाई बताते हुए अशोक ने खुद बताया कि अशोक एक मोची हैं जो कि पिछले दो दशक से ही लोगों के जुते चमका कर अपनी रोजीरोटी का जुगाड़ करते थे. आसपास के लोगों ने बताया कि अशोक का घर फुटपाथ हुआ करता था.

बीच में बैठे हुए शख्स अशोक परमार ही हैं.

“मुझसे एक पत्रकार ने कहा ‘ये’हाथ में लेकर खड़े हो जाओ” 

“परमार ने बताई उस दिन की सच्चाई”अशोक परमार (42) एक मोची हैं, जो कुछ आस पास के लोगों के अनुसार शाहपुर में फुटपाथ पर रहते हैं.

अशोक ने बताया कि, “इन दंगों से महज़ कुछ दिनों पहले ही जिस लड़की को मैं चाहता था उसकी शादी हुई थी. मैं ‘उस दुर्भाग्यपूर्ण’ दिन लगभग यही कोई 10 बजे के करीब भारी मन से अपने काम पर लौटा था. शहर में बंद चल रहा था जिससे मुझ जैसे हजारों दिहाड़ी काम करने वालों का भारी नुकसान हो रहा था. मैं इन सब के चलते अपने काम से हाथ धो बैठा था और मेरे पास खाने तक को पैसे नहीं थे. मैं गुस्सा था. गुस्सा, खुद की इस हालत पर. गुस्सा, इस बात पर की शहर में जो कुछ भी हो रहा था. शहर में बहुत गलत हो रहा था. हिन्दू लोग मुसलमानों को मार रहे थे. उस वक़्त मेरी भी दाढ़ी आ गयी थी जिसके चलते मैं मुसलमान लग रहा था. ऐसे में खुद को बचाने के लिए मैंने अपने सिर पर केसरिया पट्टा बांध लिया था कि तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरी जिंदगी बदल कर रख दी.”

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“मैं वहां खड़ा ही था कि तभी एक फोटोग्राफर (सेबास्टियन डीसूजा, जो की मुंबई मिरर से थे) मेरे पास आये और उन्होंने मुझसे कहा “एक दंगाई की तरह पोज़ करो. मैंने भी झट से एक लोहे का सरिया उठाया और झूठमूठ का गुस्सा दिखाया और उन्होंने मेरी वही तस्वीर खींच ली. अगले दिन से मेरी ज़िन्दगी अब बदल गयी थी. मैं लगभग हर पेपर, न्यूज़चैनल के पहले पन्ने पर था. तभी से मुझे गुजरात दंगो का एक मुख्य चेहरा माने जाने लगा गया है. इतना ही नहीं मैं उस तस्वीर के चलते 14 साल जेल भी जा चुका हूँ. हालाँकि इतना सब के बाद निचली अदालत ने मेरे खिलाफ एक भी सबूत ना होने के चलते मुझे बरी कर दिया. ”

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इस तस्वीर की बात बताते हुए अशोक ने बताया कि, “अगर आप भी वो तस्वीर देखेंगें तो मैं वहां आपको अकेला नजर आऊंगा. मैं किसी दंगा करने वाले समुदाय का हिस्सा नहीं था. मैंने जिस समय ये तस्वीर खिंचाई थी, यकीन मानिये ,मुझे रत्ती भर भी इस बात का अंदाज़ा नहीं हुआ था कि मैं उसके चलते इतनी बड़ी मुसीबत मोल ले लूँगा, लेकिन अफ़सोस वही हुआ.”

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