200 साल पहले हुए युद्ध का जश्न मनाने के लिए लाखों दलित पुणे के भीमा कोरेगांव में इकट्ठा हुए थे. यह युद्ध 1818 में  पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना और अंग्रेजों की सेना के बीच हुआ था लेकिन अंग्रेजों की सेना में महार अधिक संख्या में थे और उसे वो अंग्रेजों की जीत नहीं बल्कि पेशवाओं पर महारों की जीत के रूप में देखते हैं. इसीलिए साल की पहली तारीख को भारी संख्या में दलित भीमा कोरेगांव स्थित युद्ध स्मारक पहुँचते हैं. 1 जनवरी 2018 को दलितों की संख्या लाखों में हो गयी थी, क्योंकि इस युद्ध के दो सौ साल पूरे हुए थे. दूसरे तरीके से समझे तो पता चलता है कि इस युद्ध का जश्न जातीय आधार पर भी मनाया जा रहा था. जहां दलित खुश थे सवर्णों की हार पर, वहीं सवर्ण खुन्नस में थे कि उनके ही देश में उन्हीं के लोग उन्हीं के खिलाफ अंग्रेजों की जीत का जश्न मना रहे हैं.

Source

1 जनवरी से लेकर अब तक जो भी कुछ हुआ उससे हटकर एक अलग तथ्य सामने आया है जो महारों को लेकर है. अमर उजाला की खबर के मुताबिक गोविंद गायकवाड़ जोकि एक महार थे उन्होंने छत्रपति शिवाजी के बेटे संभाजीराजे भोसले का अंतिम संस्कार किया था. दरअसल आपको इसकी पूरी कहानी बताएं लेकिन उससे पहले ये बता दें कि ये तथ्य इसलिए भी अहमियत रखता है क्योंकि महार गोविन्द गायकवाड़ की समाधि पुणे जिले के वाधू गांव में स्थित है. अमर उजाला की खबर के मुताबिक 29 दिसंबर को गोविन्द की समाधि का अपमान किया गया था. बताया जा रहा है कि यह पहले से तय था कि 1 जनवरी को जश्न मनाने के लिए लाखों की तादाद में दलित इकट्ठा होंगे. इसके बावजूद समाधि का अपमान करना, एक साजिश की तरफ इशारा करता है.

संभाजी महाराज समाधि

क्या शिवाजी महाराज के बेटे का अंतिम संस्कार एक महार ने किया था ?

बताया जाता है कि शिवाजी महाराज के बेटे संभाजीराजे भोसले की मृत्यु जिस वक्त हुई उस वक्त मुग़ल शासक बड़े ही क्रूर तरीके से शासन कर रहे थे. किसी की हिम्मत नहीं हो रही थी कि संभाजीराजे भोसले का शव छू सके. ऐसा करने वाले को मौत के घाट उतार दिया जाता लेकिन इसके बावजूद उनका अंतिम संस्कार हुआ और इसका श्रेय महार गोविन्द गायकवाड़ को जाता है. कहा जाता है कि मुगलों के खौफ से बेफिक्र होकर महार गोविन्द गायकवाड़ ने वीरता का परिचय दिया.

Source

यह घटना सोचने पर मजबूर करती है कि एक गोविन्द गायकवाड़ थे जिन्होंने संभाजीराजे भोसले का अंतिम संस्कार किया और एक आज का परिवेश है जिसमें आज के दलित जो 200 साल पहले हुए उस युद्ध का जश्न मनाकर पेशवाओं को चिढ़ाने की कोशिश कर रहा है. वहीं दूसरी परिस्थिति ये भी है कि एक गोविन्द जैसे महार थे जिन्होंने संभाजीराजे के प्रति अपना सम्मान दिखाया लेकिन आज उन्हीं की समाधि का अपमान किया गया.

मिलिंद एकबोटे और संभाजी भिड़े

संभाजीराजे के अंतिम संस्कार को लेकर क्या कहते है भिड़े और एकबोटे

संभाजीराजे भोसले के अंतिम संस्कार को लेकर हिंदूवादी नेता संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे का कहना है कि ‘अंतिम संस्कार की इस कहानी के रचनाकार अंग्रेज थे. जबकि सत्य कुछ और है. अंग्रेजों ने इस कहानी को मनगढ़ंत तरीके से गढ़ा था. संभाजीराजे भोसले का अंतिम संस्कार मराठों ने ही किया था. इसपर अध्ययन किया जाना चाहिए.’ फ़िलहाल महाराष्ट्र में जिस तरीके से हिंसा हुई उसको देखते कहना मुश्किल है कि क्या वाकई में दलितों की लड़ाई है या फिर उनका इस्तेमाल हो रहा है.