1947 में एल्बर्ट आइन्स्टाइन ने पंडित नेहरु को लिखी थी एक चिट्ठी, जिसे पढ़कर भी नेहरु ने नहीं दिया था जवाब, लेकिन अब पीएम मोदी के दौरे के चलते कांग्रेसियों..

पिछले कई दिनों से देश के हर मीडिया चैनल पर इज़राइल का ज़िक्र छाया हुआ है. गलत नहीं होगा अगर हम कहें कि इसका एक बड़ा कारण है देश के प्रधानमंत्री का 4 से 6 जुलाई के बीच होने वाला इज़राइली दौरा. इस दौरे के बारे में अबतक ना जाने कितनी बातें कही सुनीं गयीं हैं लेकिन इज़राइल और भारत से जुड़ी कई ऐसी बातें भी हैं जिनके बारे में आप यकीनन नहीं जानते होंगे. जहाँ एक तरफ पीएम मोदी का ये इज़राइली दौरा कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है तो वहीँ दूसरी तरफ पीएम मोदी का ये दौरा कांग्रेस पार्टी के लिए चिंता का सबब बना हुआ है. यहाँ हम आपको बता दें कि जहाँ ये दौरा किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री का पहला इज़राइली दौरा होने वाला है तो वहीँ इस बात पर भी गौर करना ज़रूरी है कि आजतक कांग्रेस पार्टी की तरफ से किसी भी नेता ने कभी भी इज़राइल का दौरा नहीं किया है.

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अब पीएम मोदी के इज़राइल दौरे पर निकल रही है कांग्रेस की भड़ास 

विपक्षी होने के नाते यूँ तो कांग्रेस पार्टी ने वक़्त-बेवक्त पीएम मोदी के इन विदेशी दौरों पर सवाल उठाये हैं लेकिन हाल ही में उन्होंने पीएम के इज़राइल दौरे का स्वागत किया था. वो अलग बात है कि इस स्वागत के कुछ समय बाद ही भारत-इज़राइल के इस अहम मुलाकात पर जहर उगलते हुए कांग्रेस पार्टी ने बयान जारी कर दिया है कि, “कहीं फिलिस्‍तीन के संबंधों की कीमत पर तो इजरायल का दौरा तो नहीं हो रहा है?”

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ये है कांग्रेस के भड़ास की असली वजह

कांग्रेस की भड़ास की असली वजह की दरअसल एक कहानी है.  इस कहानी की शुरुआत होती है 29 नवम्बर 1947 से जब भारत की आजादी के बाद 29 नवंबर को संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के मुद्दे पर वोटिंग होनी थी. उस वक़्त इज़राइल ने भारत से समर्थन अपने हिस्से में करने के लिए उस वक़्त के सबसे बड़े आदर्श, दुनिया के महान वैज्ञानिक और यहूदीयों का चेहरा माने जाने वाले एल्बर्ट आइन्स्टाइन को भारत भेजा था.

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पंडित नेहरु को अपना दोस्त मानते थे एल्बर्ट आइन्स्टाइन

ये बात तो सभी जानते थे कि उस वक़्त एल्बर्ट आइन्स्टाइन और पंडित जवाहरलाल नेहरु एक दूसरे के प्रशंसक भी थे और काफी हद तक उनमे मित्रता भी थी. 13 जून 1947 को आइंस्टाइन ने पं. नेहरू को चार पेज का एक खत लिखा. इस खत में आइंस्टाइन ने​ लिखा था कि प्राचीन लोग, जिनकी जड़ें पूरब में है, अरसे से अत्याचार और भेदभाव झेल रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि अब उनके साथ इन्साफ होना चाहिए, उन्हें भी सामान हक़ मिलना चाहिए.

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 इस ख़त में यहूदीयों के साथ हो रही ज्यादती की भी बात लिखी थी

इस ख़त की महज़ कुछ पंक्तियाँ जानकर आपको भी इस ख़त की गंभीरता समझ आ गयी होगी, लेकिन यहाँ एल्बर्टआइंस्टीन को एक बड़ा झटका उस वक़्त लगा जब उन्हें कई महीनों तक इस ख़त का जवाब नहीं मिला. ख़त का जवाब ना मिलने का कारण ये था कि इस ख़त को पंडित नेहरु ने कई महीनों के लिए खुद तक दबाये रखा था. यहाँ हम आपको ये भी बता दें कि इस ख़त में पंडित नेहरु से मदद की आस में एल्बर्ट आइन्स्टाइन ने  पं नेहरू को यह भी तर्क दिया था कि यहूदीयों पर हो रहे ज़ुल्म को देखकर लगता है कि अब बहुत हुआ, अब उन्हें एक अलग राष्ट्र क्यों मिलना चाहिए|

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महीने बाद पंडित नेहरु ने दिया ख़त का जवाब

अब महीना बीत चुका था. आखिरकार 11 जुलाई को पंडित नेहरु ने  एल्बर्ट आइंस्टाइन के ख़त का जवाब दिया. उन्होंने अपने जवाब में लिखा कि, “मुझे यहूदियों के प्रति बेहद सहानुभूति है, लेकिन मुझे अरब लोगों के लिए भी उतना ही स्नेह है. मैं जानता हूं कि यहूदियों ने फिलिस्तीन में बहुत शानदार काम किया है और फिलिस्तीन का जीवन सुधारने में इनका बड़ा योगदान रहा है.”

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ख़त के अंत में पंडित नेहरु ने सवाल किया कि, “आखिर इतने बेहतरीन कामों और उपलब्धियों के बावजूद यहूदी अरब का दिल जीतने में कामयाब क्यों नहीं हुए? आखिर ऐसी क्या वजह है जिसके चलते अरब को उनकी इच्छा के खिलाफ  क्यों अपनी मांगें मानने के लिए विवश करना चाहते हैं?

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कुछ इस तरह भारत और इज़राइल आये करीब

पंडित नेहरु की इसी सोच पर  1992 तक भारत की विदेश नीति चलती रही लेकिन जैसे ही 1991 में सोवियत संघ रूस का विघटन हुआ और भारत के आर्थिक सुधार के तहत अमेरिकी संबंधों के दरवाजे खोले इसमें अमेरिकी संबंधों की छाव में इजरायल से करीबी रिश्ते बनने की शुरूआत हुई.

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यहाँ ये बात गौर करने वाली है कि 29 जनवरी 1992 को फिलिस्तीन के राष्ट्रपति यासिर अराफात की अनुमति के बाद ही भारत ने इज़राइल के साथ अपने संबंध मज़बूत बनाने शुरू किये.  रिश्ता बने तो 25 साल बीत गए लेकिन किसी ने कभी इज़राइल जाकर रिश्तों को सींचने की कोशिश नहीं की. इन 25 सालों में ऐसा पहली बार हो रहा है जब भारत का कोई प्रधानमंत्री इज़राइल दौरे पर गया है.

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देश के ये बड़े नेता भी जा चुके हैं इज़राइल लेकिन…

हालाँकि पीएम मोदी भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री बन चुके हैं जिन्होंने इज़राइल का दौरा किया है, लेकिन इनसे पहले लगभग दो साल पहले देश के मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी इज़राइल के एअरपोर्ट पर उतरे थे. राष्ट्रपति उतरे एअरपोर्ट पर उतरे जरुर थे लेकिन वो पहले फिलिस्तीन गए और उसके बाद इज़राइल दौरे पर गए थे. इसके बाद साल 2016 में जनवरी महीने में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी पहले फिलिस्तीन गयीं और उसके बाद उन्होंने इज़राइल का दौरा किया लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजरायल पहुंचेंगे तो तीन दिन सिर्फ-और-सिर्फ इजरायल में ही गुजारेंगे.

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