कार्यकाल खत्म होने से एक महीने पहले राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने जाते-जाते भी जो किया है उसे सालों साल याद रखा जायेगा!

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देश में जहाँ एक तरफ राष्ट्रपति पद के लिए चुनाव धीरे-धीरे नज़दीक आते जा रहे हैं वहीँ दूसरी तरफ लगभग रोज़ ही नए-नए उम्मीदवारों का नाम भी सामने आये जा रहा है| ऐसे में इन्ही सब ख़बरों के बीच एक बड़ी खबर ये आई है कि जाते-जाते भी राष्ट्रपति प्रणब मुख़र्जी ने कुछ ऐसा किया है जिसके चर्चे उनके राष्ट्रपति पद छोड़ देने के बाद भी हर जगह रहेंगे|

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दरअसल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कार्यकाल पूरा होने से पहले दो और दया याचिकाओं को खारिज कर दिया है। राष्ट्रपति मुखर्जी ने बलात्कार और हत्या से जुड़ी इन दोनों दया याचिकाओं पर मई के आखिरी हफ्ते में फैसला किया है। इसमें से एक मामला इंदौर का है, जिसमें 2012 में तीन लोगों ने चार वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी थी। दूसरा मामला पुणे का है, जिसमें कैब ड्राइवर और उसके साथियों ने एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर के साथ बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी।

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रिपोर्ट के मुताबिक इन दोनों मामलों के साथ राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा पांच साल में खारिज की गई दया याचिकाओं की संख्या 30 पहुंच गई है। संविधान के अनुच्छेद-72 के तहत राष्ट्रपति को किसी भी अपराध के लिए दोषी ठहराए गए व्यक्ति की सजा माफ करने, निलंबित करने या घटाने का अधिकार हासिल है, लेकिन, राष्ट्रपति यह फैसला मंत्रिमंडल की सलाह पर करता है।

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मौजूदा नियमों के तहत गृह मंत्रालय की राय को मंत्रिमंडल की राय मान लिया जाता है, जिसकी लिखित सिफारिश के आधार पर राष्ट्रपति फैसला कर सकते हैं। हालांकि, राष्ट्रपति द्वारा इस पर फैसला करने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं है। दया याचिकाओं को लेकर अलग-अलग राष्ट्रपतियों के रुख में अंतर रहा है। उदाहरण के लिए राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने दो दर्जन से ज्यादा दया याचिकाओं में से केवल दो पर फैसला किया था।

वहीं, उनसे पहले राष्ट्रपति रहे केआर नारायणन ने अपने पांच साल के कार्यकाल में एक भी दया याचिका पर फैसला नहीं किया था। इसके अलावा पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने भी अपने कार्यकाल में किसी भी दया याचिका पर फैसला नहीं किया था। हालांकि, अब तक सबसे ज्यादा 44 दया याचिकाओं को ठुकराने का रिकॉर्ड पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण के नाम है।

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