एक योग गुरु जो घंटों बंद कमरे में इंदिरा गाँधी के साथ बिताते थे ‘रंगीन पल’ और इसकी आज़ादी उन्हें दी थी खुद…

20077

 भारत की राजनीति में एक परिवार हमेशा से ऐसा रहा है जिनका विवादों से चोली-दामन का साथ रहा है तो वो हैं गाँधी परिवार. आप खुद इस परिवार का इतिहास उठा कर देख लीजिये, जितने इनके “काम” नहीं हैं उससे ज्यादा तो इनके “कारनामे” हैं. ऐसा ही गाँधी परिवार का अब एक और किस्सा दुनिया के सामने आ रहा है. हालाँकि हम अभी ये तो नहीं कह सकते कि इस मामले में कौन सही है कौन नहीं लेकिन गाँधी परिवार पर जिस तरह से इस बार इल्ज़ाम लगाये जा रहे हैं उन्हें देखकर शायद अनदेखा भी नहीं किया जा सकता.

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आपने अक्‍सर ही बाबा रामदेव या श्रीश्री रविशंकर जैसे आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवाओं से लेकर एफएमसीजी कारोबार के बारे में सुना ही होगा. लेकिन आज हम आपको एक ऐसे बाबा के बारे में बताने जा रहे हैं जो दवाओं के नहीं बल्कि बंदूकों के सौदागर थे. और इनकी सबसे ख़ास बात तो ये थी कि ये इंदिरा गाँधी के बेहद ही ख़ास थे.

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नाम था धीरेन्द्र ब्रह्मचारी

इंदिरा गाँधी के इस ख़ास गुरु को दुनिया योगा गुरु के तौर पर जानती थी, लेकिन उनकी सच्चाई इससे एकदम विपरीत थी. वो योग गुरु कम बल्कि एक बहुत बड़े डिफेंस डीलर हुआ करते थे.

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जानने वाले बताते हैं कि इस बाबा की पहुंच सीधे पीएम के घर तक थी और उनकी लग्‍जरी लाइफ स्‍टाइल उस दौर के सेलिब्रिटीज को भी मात दे दिया करती थी. ये ऊँची रसूख वाले योग गुरु कोई और नहीं बल्कि 70 और 80 के दशक के सबसे विवादित और मशहूर योग गुरू धीरेंद्र ब्रह्मचारी थे.

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 देश के अब तक के सबसे बड़े योग गुरुओं में से एक हैं धीरेन्द्र ब्रह्मचारी

इतिहास कुछ भी हो लेकिन भारत में योग को बढ़ाने में धीरेन्द्र ब्रह्मचारी की काफी अहम भूमिका रही है, और शायद यही वजह है जिसके चलते वह अपने दौर में काफी चार्चित भी रहे हैं. ये योग गुरु इतने रसूख वाले थे कि राजनीतिक गलियारों में उस दौर के कांग्रेस नेताओं से उनकी खास नजदीकियां देखने को मिलती थी.

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जितना बड़ा नाम उतना बड़ा विवादों से नाता

ये सब तो फिर भी ठीक था लें धीरेन्द्र ब्रह्मचारी उतने ही विवादित भी रह चुके हैं. धीरेन्द्र पर जमीन हड़पने से लेकर अवैध हथियार रखने जैसे कई आपराधिक आरोप भी लगे थे.

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इंदिरा गाँधी के थे बेहद करीबी

जानकारी के लिए बता दें कि धीरेंद्र ब्रह्मचारी 1970 और 80 के दशक में मीडिया में काफी सुर्खियों में रहे हैं. माना जाता था कि धीरेन्द्र देश की तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का काफी खास राजदार थे.

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इमरजेंसी के दौर में आये थे सुर्ख़ियों में 

यही नहीं धीरेन्द्र इमरजेंसी के दौर में और भी ज्यादा पॉपुलर हो गए थे. मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो इंदिरा गांधी के लगभग सभी बड़े फैसलों में धीरेन्द्र की एक बड़ी भूमिका रही थी.

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संजय गाँधी की मौत के बाद धीरेन्द्र के करीब आयीं थी इंदिरा 

धीरेन्द्र और इंदिरा गाँधी के ख़ास रिश्तों के बारे में कहा जाता है कि इंदिरा गांधी अपने छोटे बेटे संजय गांधी के बाद सबसे ज्‍यादा भरोसा धीरेंद्र ब्रह्मचारी पर ही किया करती थीं. यहाँ तक कि संजय की मौत के बाद ही इंदिरा धीरेन्द्र के करीब आयीं थीं.

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खुशवंत सिंह ने बताया था बंद कमरों के पीछे का सच 

पत्रकार खुशवंत सिंह जिन्हें एक समय में नेहरु परिवार के बेहद करीब माना जाता था उन्होंने धीरेन्द्र ब्रह्मचारी का ज़िक्र करते हुए बताया था कि, धीरेन्द्र एक हट्टे-कट्टे, खूबसूरत बिहारी थे जो हर सुबह घंटों तक इंदिरा गाँधी के साथ उनके कमरे में रहा करते थे.

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खुशवंत सिंह ने बेझिझक इस बात का भी ज़िक्र किया कि इसमें कोई अचरज की बात नहीं होगी अगर पता चले कि इंदिरा और धीरेन्द्र के ये योग का समय कामसूत्र के पल में तब्दील होने की बात पता चले.

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हाँ लेकिन बाद में ये बात भी सामने आई थी कि योगी धीरेन्द्र को इंदिरा गाँधी को योगा सीखाने की छूट किसी और ने नहीं बल्कि उनके पिता पंडित जवाहर लाल नेहरु ने ही दी थीं.

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धीरेंद्र ब्रह्मचारी की लाइफ स्‍टाइल बड़े-बड़े सेलिब्रिटीज को भी मात देती थी

बताया जाता है कि जिस वक्‍त देश में गिनती के लोग हवाई सफर किया करते थे, उस दौर में धीरेंद्र ब्रह्मचारी के पास अपना खुद का लग्‍जरी जेट हुआ करता था. उनके इसी राजसी ठाठ के चलते उस दौर में मीडिया उन्‍हें फ्लाइंग योगी भी कहा करती थी.

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जानकरी के मुताबिक धीरेंद्र ब्रह्मचारी के जम्‍मू स्थित अपर्णा आश्रम को 2000 के दौर में हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीज कर दिया गया था. बताया जाता है कि इस आश्रम के पास ही उनके विमान के उतरने के लिए एक निजी हवाई पट्टी भी बनाई गई थी.

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गुडगांव के हैंगर में आज भी पड़ा है फ्लाइंग योगी का जेट    

धीरेंद्र ब्रह्मचारी का लग्‍जरी लेट आज भी गुड़गांव में उनके आश्रम के हैंगर के सेक्‍टर 32 के एक प्‍लाट में मौजूद है. हाँ लेकिन हालत जर्जर है. यह बुरी तरह टूट- फूट चुका है. बता दें कि इसे लेकर उनके परिवार और पूर्व शिष्‍य कश्‍मीर सिंह पठानिया के बीच कई सालों से मुकदमा भी चल रहा है. पठानिया का दावा है कि धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने यह आश्रम उन्‍हें दे दिया था.

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सबसे बड़े आर्म डीलर भी थे धीरेन्द्र ब्रह्मचारी 

 योगगुरु धीरेंद्र ब्रह्मचारी उस दौर के सबसे बड़े आर्म डीलर भी माने जाते थे. रामचंद गुहा के मुताबिक, उस दौर के लगभग सभी बड़े रक्षा सौदों में उनकी भूमिका अहम होती थी. जानकार बताते हैं कि उस वक़्त में स्वीडन की कई कंपनियों से धीरेन्द्र के काफी बेहतर संबंध बन चुके थे.

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हालाँकि एक बार धीरेन्द्र की फैक्‍ट्री में सौ से भी ज्‍यादा अवैध स्वीडिश बंदूकें भी बरामद बरामद हुई थीं, जिसे लेकर ब्रह्मचारी की काफी किरकिरी भी हुई थी.

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रोचक है ब्रह्मचारी की मौत का किस्‍सा 

जिसकी ज़िन्दगी इतनी दिलचस्प रही हो ज़रा सोचिये उसकी मौत कितनी रोचक रही होगी. जी हाँ धीरेंद्र ब्रह्मचारी की मौत का किस्‍सा भी काफी रोचक माना जाता है. दरअसल उन्‍होंने अपनी मौत की भविष्‍यवाणी पहले ही कर दी थी.  कहा जाता है कि ब्रह्मचारी की मौत एक प्लेन हादसे में उसी दिन हुई जिस दिन की उन्होंने भविष्यवाणी की थी.

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जब रोयीं थी इंदिरा गाँधी

यूँ तो आयरन लेडी के नाम से मशहूर इंदिरा गाँधी एक शशक्त महिला थीं, लेकिन एक वाकये ने उन्हें तोड़ कर रख दिया था. ये वो मौका था जब इंदिरा को देश ने रोते हुए देखा था. वो मौका था संजय गाँधी की मौत का.
23 जून 1980 को विमान हादसे में संजय गांधी की मौत के बाद कई तरह के कयास लगाए गए. यहाँ तक की उनकी मौत के बारे में ये तक कहा जाता है कि संजय हवाई जहाज भी इस तरह से उड़ाते थे जैसे कोई सड़क पर कार चला रहा हो.

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1976 में संजय को हल्के विमान उड़ाने का लाइसेंस मिला था. बताया जाता है कि इमरजेंसी के बाद मोरारजी देसाई की सरकार ने उनका लाइसेंस कैंसिल कर दिया था. हालाँकि इंदिरा गाँधी सत्ता में दोबारा आयीं तो उनका लाइसेंस भी उन्हें वापस मिल गया.

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मई 1980 में  इंदिरा गांधी के बेहद करीबी धीरेंद्र ब्रह्मचारी ने ही संजय के लिए पिट्स एस 2ए आयात करवाया था.बताया जाता है कि इस छोटे विमान को जल्दबाजी में ही दिल्ली के सफदरजंग हवाई अड्डे पर असेम्बल कर दिल्ली के फ्लाइंग क्लब को सौंप दिया जाता है, ये बोल कर कि संजय इसकी टेस्ट उड़ान भरना चाहते थे.

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हालाँकि एक बार फिर सुरक्षा कारणों के चलते उनको यह मौका नहीं मिला, लेकिन 20 जून 1980 को क्लब के इंस्ट्रक्टर ने विमान को उड़ाकर देखा जिसके बाद 21 जून को संजय ने पहली बार इस प्लेन का ट्रायल लिया. 22 जून को संजय गाँधी अपनी पत्नी मेनका गांधी, मां इंदिरा गांधी, आरके धवन और धीरेंद्र ब्रह्मचारी को लेकर 40 मिनट की एक उड़ान भरते हैं.

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इसके बाद 23 जून को माधवराव सिंधिया उनके साथ पिट्स की उड़ान भरने वाले थे, लेकिन संजय गांधी सिंधिया के बजाए दिल्ली फ्लाइंग क्लब के पूर्व इंस्ट्रक्टर सुभाष सक्सेना के घर जा पहुंचे. संजय कैप्टन सक्सेना से घर पहुँच कर कहते हैं कि कप्तान सक्सेना उनके साथ फ्लाइट पर चलें. संजय अपनी कार पार्क करने चले गए और सुभाष अपने एक सहायक के साथ फ्लाइंग क्लब पहुंच जाते हैं.

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कैप्टेन सक्सेन वहां चाय पीने लगते हैं कि इतने में ही एक प्यून वहां आता है और बताता है कि संजय गांधी विमान में बैठ चुके हैं और उन्हें तुरंत बुला रहे हैं. कैप्टन सक्सेना पिट्स के अगले हिस्से में जाकर बैठते हैं और संजय ने पिछले हिस्से में बैठकर कंट्रोल संभाला.

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करीब सात बजकर 58 मिनट पर उन्होंने टेक ऑफ किया. संजय ने सुरक्षा नियमों को दरकिनार करते हुए रिहायशी इलाके के ऊपर ही तीन लूप लगाए. वो चौथा लूप लगाने ही वाले थे कि कैप्टन सक्सेना के सहायक ने नीचे से देखा कि विमान के इंजन ने काम करना बंद कर दिया है.

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पिट्स तेजी से मुड़ता है और ज़मीन से जा टकराता है. ये अंत था. एक सदी का अंत. दो जीवन का अंत.  संजय गांधी का शव विमान से चार फुट की दूरी पर पड़ा था और कैप्टन सक्सेना के शरीर का निचला हिस्सा विमान के मलबे में दबा हुआ था और उनका सिर बाहर निकला हुआ था.

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…जिसे देख इंदिरा गाँधी, या यूँ कहिये देश की आयरन लेडी यूँ बिलख कर रोयीं थीं कि लोग उसे आज भी याद करते हैं तो सन्न रह जाते हैं.

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