अलाउद्दीन खिलजी की बेटी ने इस क्षत्रिय राजकुमार के साथ किया था कुछ ऐसा कि अगर उसपर फिल्म बन जाये तो बवाल मच जाये

234

इन दिनों पद्मावती फिल्म को लेकर खूब बवाल मचा हुआ है. ‘करणी सेना’ का कहना है कि इस फिल्म के जरिये रानी पद्मावती को गलत तरीके से दिखाया गया है, जोकि हिन्दू धर्म और खासकर क्षत्रियों की भावनाओं का अपमान है. इस फिल्म को लेकर करणी सेना ने काफी विरोध भी किया है. कहते हैं कि इस फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और रानी पद्मावती के बीच प्रेम सबंधों का जिक्र हुआ है, हालाँकि खबर लिखने तक मैंने फिल्म नही देखी इसलिए इसपर ज्यादा टिप्पणी करना ठीक नही होगा. फिलहाल आपको आज इतिहास की एक ऐसी कहानी बताने जा रहे हैं जो पद्मावती के ठीक उलटी है.

Source

दरअसल बात अलाउद्दीन खिलजी की बेटी की है, जो जालौर के वीर राजपूत राजकुमार वीरमदेव से बेपनाह मुहब्बत करती थी. दोनों युवा थे, तो लाजमी है कि आकर्षण भी अपनी युवावस्था में होगा. मामला कुछ ऐसा था कि जालौर जिसे पहले जाबलिपुर के नाम से जाना जाता था. राजा कान्हड़ देव का पुत्र राजकुमार वीरमदेव कुश्ती में पारंगत थे और उनकी यह ख्याति दूर-दूर तक थी. उन दिनों वीरमदेव दिल्ली दरबार में रहते थे, उम्र महज 22 साल थी, युवा थे और आकर्षण से भरपूर. इन्हीं सब कारणों से अलाउद्दीन खिलजी की बेटी शहजादी फीरोज वीरमदेव को अपना दिल दे बैठी. इनकी प्रेम कहानी में आगे जो हुआ वो दुखद भी है लेकिन जो लोग खुद को कट्टर समझते हों वो अपना-अपना मतलब निकाल सकते हैं.

Source

यहां कोई भी धारणा बनाने से पहले ठीक तरीके से समझिएगा कि वीरमदेव ने नही बल्कि शहजादी फीरोज ने वीरमदेव से प्यार की शुरुआत की थी. वेब दुनिया वेबसाइट के मुताबिक शहजादी ने जिद पकड़ ली कि ‘निकाह करुँगी तो सिर्फ वीरमदेव से नही तो जिंदगीभर कुंवारी रहूंगी.’ बेटी की जिद अलाउद्दीन खिलजी को पता चली तो उसने राजनैतिक फायदा और अपनी हार का बदला लेने के लिए राजकुमार से शादी का प्रस्ताव भेजा. शादी का प्रस्ताव देखते ही वीरमदेव ने मना कर दिया. प्रस्ताव के बदले में जवाब दिया कि “अगर मैं तुरकणी से शादी करूं तो मामा (भाटी) कुल और स्वयं का चौहान कुल लज्जित हो जाएंगे और ऐसा तभी हो सकता है जब सूरज पश्चिम से उगे.”

Source

जवाब ऐसा था कि अलाउद्दीन खिलजी आगबबूला हो गया, और युद्ध का ऐलान कर दिया. एक साल तक जालौर के किले पर तुर्कों की सेना ने घेरा डाले रखा और जब युद्ध हुआ तो किले की हजारों रानियों ने जौहर किया. इतना ही नही 22 साल के राजकुमार वीरमदेव को युद्ध में वीरगति प्राप्त हुई. जब वीरमदेव को वीरगति मिली तो तुर्की सेना उनके सिर को दिल्ली ले गयी जिसे देखकर शहजादी फीरोज दुखी हो गयी. कहा तो ये भी जाता है कि जब वीरमदेव का सिर शहजादी के सामने लाया गया तो वीरमदेव के मस्तक ने मुंह फेर लिया. बाद में उन्होंने उस सिर का अग्नि संस्कार किया. विरह की वेदना में जल रही शहजादी फीरोज ने यमुना नदी में कूदकर जान दे दी.

Loading...
Loading...