इस कुकर्म के आरोपी कुछ दलित थे और उस दिन के बाद से महाराष्ट्र में…

ये तो तय है कि भीमा कोरेगांव में जो कुछ भी हुआ उसके पीछे बड़ा नेता बनने की चाह, दलितों की भावनाओं से खिलवाड़ और अपना स्वार्थ, एक बड़ा कारण रहा लेकिन इन सबके बीच अपने एक भी बार सोचा है कि आखिर जिस हिन्दू समाज में एक होने के लिए बड़े जोरों-शोरों से सभी जातियों को एक किया जा रहा हो, उसी परिवेश में आखिर मराठों और दलितों के बीच जंग क्यों छिड़ गयी. इसमें सोचने के लिए एक नजरिया ये भी हो सकता है कि आखिर फायदे के लिए ऐसे जनांदोलन अधिकतर वही क्यों तेजी पकड़ रहे हैं जहां बीजेपी सरकार है. फ़िलहाल एक तथ्य और भी है जिसके अनुसार आप बड़ी आसानी से समझ जायेंगे कि आखिर मराठों और दलितों के बीच ये कोहराम क्यों मचा हुआ है.

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दरअसल दलितों की अगुवाई करने वाले प्रकाश आंबेडकर, जिग्नेश मेवाणी जैसे लोगों का आरोप है कि महाराष्ट्र में हुई हिंसा में संघ और हिन्दुत्वादी नेता संभाजी भिड़े और मिलिंद एकबोटे का हाथ है. जिस संघ पर आरोप लगाये जा रहे हैं, उसका इतिहास ही यही रहा है कि उसने हिन्दू धर्म को मजबूत करने के लिए जातिवाद से अलग होने की वकालत की है. संघ ने हमेशा जाति भूलकर हिन्दू होने की वकालत की है लेकिन अगर ऐसा है तो फिर महाराष्ट्र में किस वजह से दलितों और मराठों के बीच दीवार खड़ी हो गयी ? और इसी आग का फायदा कुछ लोग अपनी राजनीतिक रोटी सेकनें के लिए कर रहे हैं.

सांकेतिक

बीबीसी के एक आर्टिकल के अनुसार महाराष्ट्र के छोटे-बड़े शहरों, क़स्बों में सड़कों पर जुलाई 2016 से पहले मराठों की तरफ से एक मूक मोर्चा निकलता था. हाथों में भगवा झंडे लहराते हुए करीब लाखों मराठा निकल पड़ते थे. इनके इस मोर्चे में लोग बिलकुल मौन और अनुशासित रहते थे और यही इनकी पहचान और सुर्ख़ियों में रहने का कारण होता था. इस मूक मोर्चे में कोई नारा भी गूँजता था और ना ही कोई भाषण होता था.

इस तरह के मौन जुलूसों का नेतृत्व लड़कियों द्वारा होता था. इस मौन जुलुस के क्रोध में बदल जाने की भी अपनी कहानी है. दरअसल अहमदनगर ज़िले के कोपरडी गाँव में 13 जुलाई 2016 को एक मराठा किशोरी के साथ बलात्कार किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गयी. बस फिर क्या था, इस मूक मोर्चे ने रौद्र रूप धारण कर लिया.

इस बलात्कार और हत्या के आरोपी दलित थे

इस घटना के बाद मराठा चाहते थे कि दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिले और इसके लिए आन्दोलन होने लगा. यह आन्दोलन जैसे-जैसे व्यापक होता गया वैसे-वैसे मराठों और दलितों के बीच तनाव बढ़ता गया और आंदोलन में दलित-विरोधी माँगें लगातार तेज होती चली गईं.

जिसका फायदा राजनीतिक रोटी सेकेनें वालों ने अच्छे से लिया. उसी का नतीजा है आज जिग्नेश मेवाणी चर्चा में बने हुए है. जिग्नेश मेवाणी की राजनीति कुछ तरीके की है कि वो बात तो दलित हित की करेंगे लेकिन खुद के फायदे के लिए उमर खालिद जैसे लोगों के साथ भी मंच शेयर करने से नहीं कतराते.