चार जजों का मीडिया में जाना पड़ गया भारी, देखिये कैसी हालत कर दी इनकी !

सुप्रीम कोर्ट के चार जजों (जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एम.बी. लोकुर और जस्टिस कुरियन जोसेफ) ने मीडिया के सामने चीफ जस्टिस पर रोस्टर तैयार करने में भेदभाव का आरोप लगाया तो लोगों को लगा कि न्यायपालिका में कुछ गड़बड़ है. इस मामले में कुछ लोग अपनी राजनीतिक रोटियां भी सेकनें लगे थे. फ़िलहाल अब मामला सुलझने की राह पर है और नाराज जजों का कहना है कि “यह मुद्दा कोई संकट समान नहीं था.” वैसे कुछ पूर्व जज और जूनियर जज इस बात से भी खासे नाराज हैं कि आखिर अगर किसी को शिकायत थी तो वो प्रशासन समिति के पास जाते, मीडिया में जाने का मतलब बनता है ?

(बाएं से) जस्टिस कुरियन जोसेफ, जे चेलमेश्वर,,रंजन गोगोई, मदन लोकुर

NBT के मुताबिक इस नाराजगी का उदाहरण उस वक्त देखने को मिला जब कुछ जूनियर जजों ने उन चार जजों को सख्त शब्दों में जमकर सुनाया. दरअसल कोर्ट की एक परम्परा है कि दिन का काम शुरू होने से पहले सभी जज चाय पर मिलते हैं. ऐसे में 15 जनवरी को भी पारम्परिक तौर पर चाय के दौरान जब सभी जज एक साथ मिले तो एक जूनियर जज का गुस्सा फूट पड़ा और प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाले जजों को खूब खरी-खोटी सुनाई. जूनियर जज ने कहा, ‘अगर आपको नाराजगी थी तो आपने मीडिया से बात करने से पहले हमें बताना जरूरी क्यों नहीं समझा? आप प्रेस के पास क्यों चले गए? आपको रोस्टर तैयार करने को लेकर चीफ जस्टिस से कुछ शिकायत थी तो आप पहले हमसे बात करते, मीडिया में जाने की क्या जरूरत थी?”

जूनियर जज ने चारों ‘बागी’ जजों पर आरोप लगाया कि “उन्होंने मीडिया से बात कर इस मामले को राजनीतिक रंग दे दिया, जोकि नहीं करना चाहिए था. ऐसा करने से राजनीतिक दलों को न्यायपालिका की धज्जियां उड़ाने का मौका मिल गया.” जूनियर जजों ने ये भी कहा कि “अगर चारों जजों को नाराजगी थी तो एक फुल कोर्ट मीटिंग बुलाकर इस मुद्दे पर आंतरिक विचार-विमर्श कर सकते थे.” कुछ जूनियर जजों ने तो ये भी कहा कि “उन चार जजों ने मीडिया में जाकर और रोस्टर पर सवाल उठाकर ये साबित करके दिया कि बड़े केसों की सुनवाई करने की कुशलता सिर्फ वरिष्ठ जजों में ही है जूनियर जजों में नहीं.

टाइम्स ऑफ इंडिया

एक जूनियर जज ने नाराजगी भरे शब्दों में कहा, “आप लोगों ने प्रेस के पास जाकर कहा कि महत्वपूर्ण केसों की सुनवाई के लिए जूनियर बेंच के पास भेजा जाता है, इसका क्या मलतब है कि आप ये कहना चाहते हैं कि जिस केस की देश में काफी चर्चा हो, जो केस बड़े हों, उसे सुनने की योग्यता सिर्फ वरिष्ठ जजों के पास है और हम जूनियर जजों में नहीं ? हमारी बेंच ऐसे केसों पर सही फैसला नहीं दे सकती ? आपके इस व्यवहार ने न सिर्फ न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाया है बल्कि प्रत्येक जज की निष्ठा पर आपने शक के बादल खड़े कर दिए हैं.” जाहिर है कि जिस तरीके से जूनियर जजों ने न्यायपालिका की मर्यादा का ख्याल कराया है उससे उन चार माननीय जजों की बोलती बंद हो गयी होगी.