डेंगू और मलेरिया से भी घातक है ये बीमारी जिसने गोरखपुर में फैलाया है मौत का तांडव, लेकिन इससे बचाव तभी मुमकिन है अगर आप…

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से एक बड़ी ही दुखद ख़बर सामने आई है. दरअसल यहाँ बाब राघव दास मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी के चलते लगभग 48 घंटे में 63 मरीजों की जान जा चुकी है जिनमे ज्यादा तो मासूम बच्चे शामिल हैं.  इस घटना के पीछे की वजह बताई जा रही है कि अस्पताल में ऑक्सीजन सप्लाई करने वाली कंपनी का समय पर भुगतान नहीं किया गया था जिसके चलते उन्होंने हॉस्पिटल में ऑक्सीजन की सप्लाई बंद कर दी थी जिसके चलते ये बड़ी घटना हुई है.

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हालाँकि कुछ समय बीता, सरकार पर गाज गिरी तो कुछ लोगों ने इंसानों द्वारा तैयार की गयी इस आपदा को प्राकृतिक दोष बताना चाहा. लोगों ने कहा बच्चों के साथ जो हुआ उसमे सरकार का दोष नहीं है बल्कि ये एक बीमारी के चलते हुआ है.

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बीमारी है इंसेफेलाइटिस 

अब गोरखपुर में हुआ ये हादसा बीमारी है या लापरवाही अभी तक इस बात की पुष्टि तो नहीं हो पाई है हाँ लेकिन बताया जाता है कि 1977 में ये बीमारी जिसे इंसेफेलाइटिस कहते हैं उसने भारत में दस्तक दी है. अभी तक के आंकड़ों पर अगर नज़र डालें तो इंसेफेलाइटिस की वजह से हर साल करीब पांच-छह सौ बच्चों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ता है.

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ज्यादा दूर ना जायें और बात अगर इसी साल की करें तो इस साल यानी कि 2017 में भी अब तक इंसेफेलाइटिस के चलते करीब 200 बच्चों की मौत हो चुकी है. आंकड़े बताते हैं कि पिछले छह दिनों में तो 66 बच्चे दिमागी बुखार के चलते मौत के हत्थे चढ़ चुके हैं.

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कहा जाता है कि 1977 में पहली बार जापानी इंसेफेलाइटिस ने गोरखपुर में दस्तक दी थी. तब से लेकर अबतक पिछले 40 साल में करीब 10 हजार मासूम बच्चों की मौत इंसेफेलाइटिस के चलते हो चुकी है. वर्ष 2005 में इस बीमारी का सबसे भयानक कहर पूर्वांचल ने झेला और यूपी में 1500 बच्चों की मौत हुई. 2006 में 528, 2007 में 554, 2008 में  537, 2009 में 556. 2010 में 541, 2011 में 545, 2012 में 532. 2013 में 576 और 2014 में 500 मासूम बच्चों की मौत इस दिमागी बुखार के चलते मौत हुई है.

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डेंगू से ज्यादा खतरनाक होता है इंसेफेलाइटिस

बारिश का मौसम शुरू होता है तो सबसे पहले हमें डेंगू और मलेरिया की चिंता सताने लगती है. शायद हमारी चिंता जायज़ भी है लेकिन क्‍या आपको पता है कि पानी से पनपने वाली सबसे खतरनाक बीमारी कौन सी है? तो हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़ों के हिसाब से यह बीमारी इंसेफेलाइटिस ही है. हाँ लेकिन सरकारें इस बीमारी को फिर भी नजरंदाज करती रही हैं.

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क्या हैं इंसेफेलाइटिस के लक्षण 

इंसेफेलाइटिस नाम की इस जानलेवा बीमारी से पीड़ित बच्चों को ऑक्सीजन की सख्त जरूरत होती है. पूर्वांचल में इस जानलेवा बीमारी से हर साल कई बच्चों की मौत हो जाती है. यहाँ देख लीजिये कि क्या है इस बीमारी की पहचान.

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ये है पहचान

इन्सेफेलाइटिस यानी जापानी बुखार एक प्रकार का दिमागी बुखार होता है जो वाइरल संक्रमण की वजह से फैलता है. यह बीमारी एक खास किस्म के वायरस से होती है जो मच्छर या सूअर द्वारा फैलते हैं. हाँ ये बीमारी गंदगी से भी पनपती है. इस बीमारी का वायरस यदि एक बार यह हमारे शरीर के संपर्क आ जाये तो फिर यह सीधा हमारे दिमाग की ओर चला जाता है.

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दिमाग में जाते ही यह हमारे सोचने, समझने, देखने और सुनने की क्षमता पर असर डालता है. हाँ इतना घातक होने के बावजूद यह वायरस छूने से नहीं फैलता है. बताया जाता है कि ज्यादातर 1 से 14 साल के बच्चे एवं 65 वर्ष से ऊपर के लोग इसकी चपेट में आते हैं. इस बीमारी का प्रकोप साल के तीन महीने अगस्त, सितंबर और अक्टूबर में सबसे अधिक रहता है.

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जान लीजिये क्या हैं इस बीमारी के लक्षण 

बीमारी घातक है तो बेहतर होगा अगर लोग खुद में ही सतर्क रहे और इस बीमारी का कोई भी लक्ष्ण मिलते ही इसका उचित इलाज़ करा लें. इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों में बुखार, सिरदर्द, गरदन में अकड़, कमजोरी और उल्टी होना आता हैं. समय के साथ सिरदर्द में बढ़ोतरी होने लगती है और हमेशा सुस्ती छाई रहती है.

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साथ ही इस बीमारी से ग्रस्त होगो को भूख कम लगना, तेज बुखार, बहुत संवेदनशील हो जाना जैसे भी लक्ष्ण होते हैं. कुछ समय के बाद भ्रम का शिकार होना फिर पागलपन के दौरे आना, लकवा मारना आदि इस बीमारी में देखे गए हैं. छोटे बच्चों में ज्यादा देर तक रोना, भूख की कमी, बुखार और उल्टी होना जैसे लक्षण दिखने लगते हैं.

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कैसे करें इस बीमारी से बचाव ?

इन्सेफेलाइटिस से बचने का सबसे बड़ा उपाय तो यही है कि समय से टीकाकरण कराएं अपने आस-पड़ोस में साफ-सफाई रखें. इसके बाद गंदे पानी के संपर्क में आने से बचें. तीसरा,मच्छरों से बचाव घरों के आस पास पानी न जमा होने दें.बारिश के मौसम में बच्चों को बेहतर खान-पान दें.

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