संजय गाँधी को डर था कि फिल्म से उनके राज़ खुल जायेंगे,हालाकिं 1978 में वो फिल्म दोबारा बनी और इस बार…

“चोर की दाढ़ी में तिनका”. ये कहावत आपने यूँ तो कई बार सुनी होगी लेकिन अगर असल मायने में ये किसी शख्स या कहिये किसी परिवार पर उपयुक्त बैठती है तो वो है गाँधी परिवार. देश की शायद ये एक अनोखी ऐसी पार्टी रही होगी जिसने काम से ज्यादा काण्ड का डंका बजाया है, और काण्ड भी ऐसे जिनके बारे में जानकर किसी के भी कान खड़े हो जायें. गाँधी परिवार के काण्ड इतने निराले रह चुके हैं कि बॉलीवुड इंडस्ट्री ने भी इनपर मूवीज बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ा. एक बार फिर, देश में गाँधी परिवार के कुछ अनसुने किस्से उजागर होते नज़र आ रहे हैं. दरअसल बॉलीवुड में आपातकाल को लेकर एक फिल्म बनी है “इंदु सरकार.”

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इंदु सरकार को रोकने की गाँधी परिवार ने की है खूब कोशिश क्योंकि… 

जल्दी ही रिलीज़ होने वाली फिल्म इंदु सरकार से ऐसे कयास लगाये जा रहे हैं कि वो गाँधी परिवार के कई राज़ अपने साथ रुपहले पर्दे पर उतारेगी. तो जायज़ है कि गाँधी परिवार इतनी आसानी से तो ये होने नहीं देगा. ऐसे में कई ऐसे प्रयास किये गए जिससे इस फिल्म को पर्दे पर आने से पहले ही रोक दिया जाये. यहाँ तक की इस फिल्म के चलते खुद को संजय गाँधी की बेटी बताने वाली प्रियदर्शनी रॉय भी जनता के सामने आयीं जिन्होंने दावा किया है कि ये फिल्म उनके स्वर्गीय पिता संजय गाँधी को गलत तरीके से दिखाया जा रहा है.

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हालाँकि ये पहली बार नहीं है जब गाँधी परिवार का कच्चा-चिट्ठा रुपहले पर्दे के जरिये दुनिया के सामने आया हो  

“इंदु सरकार” पर कैंची चलती है कि नहीं ये तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन यहाँ हम आपको बता दें कि ये कोई पहला मामला नहीं है जब गाँधी परिवार का सच इस तरह से दुनिया के सामने आया हो. इससे पहले भी कई ऐसे मौके आये हैं जब बॉलीवुड ने गाँधी परिवार पर फिल्म बना कर जनता के सामने पेश करना चाहा. हालाँकि अंजाम अलग-अलग रहे. कभी किन्ही फिल्मों पर कैंची चल गयी, किन्ही फिल्मों का रूप बदल दिया गया, तो कभी किसी फिल्म के चलते इंदिरा गाँधी के सपूत जेल की हवा भी खा चुके हैं.

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जब एक फिल्म ने करवाए थे संजय गाँधी को जेल के दर्शन

कहानी है 1975 की जब देश में इमरजेंसी का दौर चल रहा था. ये वो दौर था जब संजय गाँधी पर तरह-तरह के आरोप लगे थे. आरोप भी ऐसे-वैसे नहीं काफी संगीन. जैसे लोगों पर की गयी ज्यादतियों के आरोप, लोगों की जबरन नसबंदी कराने का आरोप, सरकारी काम में अडंगा डालने का आरोप, मारुती उद्योग आरोप वगेरह-वगेरह. इमरजेंसी के बाद जब संजय गाँधी पर इन आरोपों के तहत मामले चलाये जाते हैं तो अंततः उन्हें हवालात की हवा खानी ही पड़ती है. लेकिन यहाँ गौर करने वाली बात ये होती है कि संजय गाँधी को जेल तक पहुँचाने के पीछे एक फिल्म का सबसे बड़ा हाथ होता है.

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“किस्सा कुर्सी का” 

1975 में देश में जब इमरजेंसी का दौर था उस वक़्त एक फिल्म आई थी, नाम था “किस्सा कुर्सी का” जिसके बाद संजय गाँधी पर इल्ज़ाम लगाया जाता है कि उन्होंने इस फिल्म के ब्लूप्रिंट खरीदे और उन्हें जला दिया है. बता दें फिल्म किस्सा कुर्सी का संजय गाँधी की ज़िन्दगी पर बनी एक पोलिटिकल स्पूफ़ थी.

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संजय गाँधी ने फिल्म का ब्लूप्रिंट नष्ट कर दिया था 

अब सवाल खड़ा होता है कि आखिरकार इस फिल्म में ऐसा क्या राज़ छुपा था जिसे दुनिया से बचाए रखने के लिए संजय गाँधी ने इतना बड़ा कदम उठाया? तो हम आपको बता दें कि गाँधी परिवार पर आधारित फिल्म किस्सा कुर्सी को बनाया था जनता पार्टी सांसद अमृत नाहटा ने. जिसके बाद आरोप लगे कि संजय गाँधी ने इस फिल्म के ब्लूप्रिंट जब्त कर उन्हें नष्ट कर डाला है.

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इल्ज़ाम साबित हुआ तो संजय गाँधी गए जेल 

मामला बढ़ा और कानूनी कार्यवाही हुई तो इस मामले में संजय गाँधी को दोषी पाया जाता है और आखिरकार उन्हें जेल भेज दिया गया. हालाँकि बाद में संजय गाँधी को दोषी बताने वाले इस फैसले को पलट दिया गया था. बताया जाता है कि फिल्म में संजय गांधी और उनके कई करीबियों के काफी कारनामों का स्पूफ दिखाया गया था जो जायज़ है गाँधी परिवार को नागवार गुज़रा. इस फिल्म में शबाना आजमी ने ‘गूँगी जनता’ का किरदार निभाया था. इस फिल्म में उत्पल दत्त गॉडमैन के रोल में दिखे थे तो वहीँ मनोहर सिंह एक राजनेता के रोल में थे जो एक जादुई दवा पीने के बाद अजब गजब फैसले लेने लगते हैं .

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1978 में दोबारा बनायीं गयी ये फिल्म लेकिन इस बार… 

इस बवाल, बवंडर के बाद इस फिल्म को दोबारा बनाने का निर्णय लिया जाता है. फिल्म दोबारा 1978 में बनी भी लेकिन पहले ही इस फिल्म को लेकर इतना विवाद हो चुका था कि दूसरी बार में कब ये फिल्म आई और कब चली गयी लोगों ने इस बात पर गौर ही नहीं किया.

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संजय गाँधी के ‘जबरन नसबंदी’ के फैसले पर भी बन चुकी है फिल्म

“किस्सा कुर्सी का” के बाद अब समय था संजय गाँधी के एक और फैसले की सच्चाई जनता के सामने लाने का. इस बार 1978 में जबरन नसबंदी के फैसले पर एक फिल्म बनायीं जाती है. ये फिल्म भी “किस्सा कुर्सी का” की ही तरह एक स्पूफ़ फिल्म होती है जिसे बनाया होता है आईएस जौहर ने. इस फिल्म में उस समय के बड़े और नामचीन कलाकार के डुप्लीकेट ने काम किया था. फिल्म में ये दिखाने की कोशिश होती है कि कैसे संजय गाँधी के एक फैसले के चलते जबरन लोगों को पकड़ा जाता है और उनकी नसबंदी करा दी जाती है.

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जो “शोले” आपने देखी है वो असली शोले नहीं है

जी हाँ, ये पढ़कर आपको एक गहरा झटका ज़रूर लगा होगा लेकिन ये बात भी सौ टका सही है. जिस फिल्म के एक-एक डायलाग को सुनकर हम आप शायद बड़े हुए हैं उस फिल्म को भी इमरजेंसी की मार झेलनी पड़ी थी. और मार भी ऐसी जिसने शोले का क्लाइमेक्स ही बदल कर रख दिया.

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शोले फिल्म के क्लाइमेक्स में ठाकुर गब्बर को सजा देने वाले थे लेकिन..

फिल्म के निर्माता रमेश सिप्पी ने शोले के क्लाइमेक्स सीन में ठाकुर के हाथों गब्बर को सजा देने का मन बनाया था. फिल्म के निर्धारित क्लाइमेक्स के हिसाब से ठाकुर मोटी-मोटी कील लगे जूतों से गब्बर को रौंद देता,  लेकिन वो इमरजेंसी का दौर था. ऐसे में सेंसर बोर्ड ने ये कह कर फिल्म का क्लाइमेक्स चेंज करवा दिया कि अगर ऐसा कुछ फिल्मों में दिखाया जाता है तो हो सकता है कहीं-न-कहीं लोगों के मन में भी ये धारणा बैठ जाये कि वो कानून अपने हाथों में ले सकते हैं.

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सेंसर बोर्ड ने कहा, “गब्बर को पुलिस के हवाले करो.”

कानून का रौब झाड़ना था तो सेंसर बोर्ड ने ये कहा कि फिल्म के अंत में ठाकुर के हाथों गब्बर को फैसला दिलाने से बेहतर होगा कि उसे कानून के हवाले करो लेकिन फिल्म को बनाने वाले रमेश सिप्पी को ये कतई नागवार नहीं गुज़रा. वो अपने पक्ष पर अड़े रहे. अनुपमा चोपड़ा की किताब ‘शोले द मेकिंग ऑफ ए क्लासिक’ में ये बात बतायी गयी है कि,

 “सिप्पी परिवार ने कई जान पहचान वालों तक अपनी बात पहुँचाई. बाप-बेटे आपस में भी उलझ बैठे. एक समय रमेश सिप्पी ने फिल्म से अपना नाम हटाने का भी मन बनाया. वकील रहे जीपी सिप्पी ने बेटे को समझाया कि इमरजेंसी में कोर्ट जाने का कोई फायदा नहीं हुआ.”

आखिरकार बदलवा ही दिया गया फिल्म का क्लाइमेक्स

शोले फिल्म की तय रिलीज़ डेट 15 अगस्त 1975 निर्धारित की गयी थी और अब 20 जुलाई हो चुकी थी. उस वक़्त संजीव कुमार (फिल्म के ठाकुर) सोवियत संघ में गए हुए थे. सेंसर बोर्ड के आदेश के चलते उन्हें आनन-फानन में भारत बुलाया जाता है. क्लाइमेक्स सीन दोबारा शूट किया जाता है, फिर से, कम समय में डबिंग, मिक्सिंग और सभी ज़रूरी काम पूरे किये जाते हैं और फिल्म आखिरकार उस तरह से तैयार कर दी जाती है जैसा की गाँधी परिवार को चाहिए था.

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फिल्म के कई महत्वपूर्ण सीन्स पर भी चली है कैंची

सिर्फ इतना ही नहीं हम आपको बता दें कि इस फिल्म में से सेंसर बोर्ड की दुहाई देकर उस सीन को भी उड़ा दिया गया है जहाँ रामलाल (ठाकुर के सेवक) ठाकुर के जूते में कील ठोक रहे होते हैं जिससे पहले ये तय हुआ था कि उसी कील जड़े जूतों को पहन कर ठाकुर गब्बर को उसके गलत कामों की सजा देंगे. लेकिन सेंसर बोर्ड की माने तो उस सीन में (जूतों में कील गाड़ने वाले) रामलाल की आँखों में विद्रोह की आग देखी जा सकती थी ऐसे में उस सीन को हटाने का फरमान जारी किया जाता है.

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आखिरकार शोले बनी और पर्दे पर आई भी लेकिन वो, वो शोले नहीं थी जो रमेश सिप्पी ने सोची थी. 

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फिल्म “आंधी” पर गांधी परिवार का तूफ़ान 

अब बात करते हैं गुलज़ार साब की फिल्म आंधी की. कहा जाता है कि ये फिल्म इंदिरा गाँधी पर आधारित थी जिसके चलते उसको इमरजेंसी के दौरान बैन कर दिया गया था. लेकिन इमरजेंसी के दौरान ही कई ऐसे कलाकार भी थे जो कि वो फिल्म के जरिये विरोध के अलावा बात आगे तक ले गए. फिल्म कलाकार देव आनंद तो इस बात से इस कदर खफ़ा हो चुके थे कि उन्होंने खुद की एक राजनीतिक पार्टी (नेशनल पार्टी ऑफ़ इंडिया) बनाने तक का फैसला ले डाला. इस बारे में देव आनंद ने अपनी ऑटोबायोग्राफी में लिखा था कि, “मैं समझ गया था कि मैं उन लोगों के निशाने पर हूँ जो संजय गांधी के करीब हैं।

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