जानें क्या थी वो असली वजह कि नाक टूटी होने के बावजूद इंदिरा गाँधी ने नहीं रोका था अपना भाषण…

कहते हैं अगर आपमें किसी चीज़ हो हांसिल करने का ज़ज्बा हो तो आप उसे हांसिल कर ही लेते हैं फिर चाहे उसे पाने के लिए आपको कितना भी कठिन परिश्रम क्यों न करना पड़े. लेकिन फर्क सिर्फ इस बात का है कि कुछ लोग इसे कर दिखाते हैं और कुछ लोग केवल सोचते ही रह जाते हैं. आपको बता दें कि इस दुनिया में ऐसी कोई भी मंजिल नहीं है जो बिना कठिन परिश्रम किये बगैर किसी को मिल गयी हो फिर चाहे इस मामले में हम किसी राजनेता की बात करें या फिर किसी अभिनेता की, हर किसी को मेहनत तो करनी ही पड़ती है.

जी हाँ हम उस शख्सियत के हौसले की बात करने जा रहे हैं जिसके ज़ज्बे की हद के बारे में जब पढेंगे तो आपके भी रौंगटे खड़े हो जायेंगे और कहेंगे कि क्या कोई ऐसी हालत में भी इतना बड़ा काम कर सकता है. लेकिन हाँ उस शख्सियत का नाम है इंदिरा गाँधी. हम बात कर रहे हैं उस दौर की जब उड़ीसा स्वतंत्र पार्टी का गढ़ हुआ करता था, और उसी दौरान एक दिन इंदिरा गाँधी एक चुनावी सभा को सम्भोधित करने पहुंची और जैसे ही उन्होंने बोलना शुरू किया तभी वहां मौजूद भीड़ ने उनपर पत्थरों की बरसात करना शुरू कर दिया.

आपको बता दें कि जैसे ही इंदिरा गाँधी पर यह हमला हुआ तभी वहां मौजूद उनकी पार्टी के नेताओं ने उनसे अपना भाषण फ़ौरन रोकने की गुज़ारिश की, लेकिन इंदिरा गांधी  नहीं मानी और उन्होंने बोलना ज़ारी रखा. 

इस तरह के आक्रोश को देखते हुए भीड़ से इंदिरा बोल ही रहीं थी कि ” क्या आप इसी तरह से लोगों को वोट देंगे, क्या इसी तरह आप देश को बनाएंगे ?” तभी उसी भीड़ से  एक पत्थर उनकी नाक पर आकर लगा जिसके बाद उनकी नाक से खून बहने लगा. इंदिरा गांधी ने अपने दोनों हाथों से अपनी नाक से बहते खून को पोछा और देखा कि उनकी नाक टूट चुकी थी. लेकिन हैरान कर देने वी बात तो यह थी कि इतने बड़े हमले के बावजूद इंदिरा ने हार बिलकुल नहीं मानी और वे देश भर में अपने चुनावी प्रचार को करती रहीं.

आपको बता दें कि इंदिरा ने कई दिनों तक अपने चेहरे पर प्लास्टर लगाये रखा था फिर भी वे बिना रुके अपने काम को करती रही. इंदिरा गांधी उनमें से थीं जो अपनी नाक को लेकर हमेशा संवेदनशील रहती थीं.लेकिन इस बार तो इंदिरा ने अपनी ही नाक का खूब मज़ाक बनाया और कहती थी कि उनकी शक्ल बिल्कुल ‘बैटमैन’ जैसी हो गई है.

वहीँ  ‘इंदिरा: इंडियाज़ मोस्ट पॉवरफ़ुल प्राइम मिनिस्टर’ की किताब लिखने वाली सागरिका घोष बताती हैं कि इंदिरा गाँधी को जब देश का प्रधानमंत्री चुना गया था तो वे संसद का सामना करने में बहुत हिचकिचाती थीं. और उस दौर में राम मनोहर लोहिया, समय मीनू मसानी और नाथ पाई जैसे दिग्गज नेता इंदिरा गांधी के द्वारा बोले जाने वाले एक-एक शब्द में नुख़्स निकालने के लिए हमेशा तत्पर रहते थे.

सागरिका घोष कहती हैं कि मेरे पिता जी भास्कर घोष बताते थे कि इंदिरा गाँधी जब सूचना और प्रसारण मंत्री के रूप में संसद में किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए खड़ी होती थीं, तो उनके हाथ बुरी तरह से कांपने लगते थे. साथ ही  सागरिका घोष  इंदिरा गांधी के  डॉक्टर के पी माथुर का ज़िक्र करते हुए बताती हैं कि के पी माथुर ने  उन्हें बताया था कि जिस दिन इंदिरा गाँधी को संसद में भाषण देना होता था उस दिन घबराहट की वजह से इंदिरा का दर्द होने लगता था या फिर पेट ख़राब हो जाया करता था.

लेकिन एक दिन ऐसा आया जब इंदिरा गाँधी संसद में  चुनाव जीत कर आयीं और कांग्रेस का विभाजन किया तो उनमें जो आत्मविश्वास आया, उसने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा.’ सागरिका घोष कहती हैं, इंदिरा गाँधी ने अब तक जो कर दिखाया था  मुझे नहीं लगता कि अब कभी भी उनके पोते राहुल गाँधी वैसा कर पायेंगे.

1967 के चुनाव में इंदिरा गांधी का भले ही वो बोल बाला ना रहा हो लेकिन बाद में उन्हें भारत की सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री जाना जानें लगा.

 

 

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