“ना गोली ना पैलेट गन” बल्कि आदिवासियों के सुझाये गए इस तरीके से कश्मीरी पत्थरबाजों से निपटेगी भारतीय सेना…

हमारे देश की सेना अपने सहिष्णुता के लिए जानी जाती है लेकिन कुछ लोग भारत देश में रहकर भारत के जवानों के साथ ही बुरा बर्ताव करते हैं, उनपर पत्थर फेंकते हैं, उनको  गालियां देते हैं, लेकिन शायद उस समय वो ये भूल जाते हैं कि जिन सैनिकों पर वो अत्याचार करते हैं, वही सेना मुसीबत के समय जान पर खेल कर उनकी रक्षा करती है। हाल ही में एक कश्मीरी पत्थरबाज़ ने बताया कि उन्हें सेना पर पत्थर फेंकने के लिए 500 से लेकर 700 रुपए रोज़ के मिलते हैं l ऐसे में सेना ने इन देशद्रोही कश्मीरी पत्थरबाजों को जवाब देने के लिए कई बार आंसू गैस, पैलेट गन का इस्तेमाल किया है लेकिन कश्मीरी पत्थरबाज़ सेना पर पत्थर बरसाने से फिर भी बाज़ नहीं आते हैं l

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हाल ही में आई एक खबर के अनुसार सेना ने कश्मीरी पत्थरबाजों से निपटने के लिए ऐसा तरीका ढूँढा है कि अब पत्थरबाजों की अक्ल ठिकाने आ जाएगी l इस बार सेना ना तो गोली का ना ही पैलेट गन का इस्तेमाल करेगी lहैरत की बात ये है कि इस शानदार तरीके को मध्यप्रदेश के आदिवासियों ने बताया है और पक्ष और विपक्ष दोनों इस बात से सहमत हैं l

दरअसल मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल झाबुआ जिले से एक सुझाव मिला है। गोफन, यानी गुलेल यहां के आदिवासियों का पारंपरिक हथियार है और युवा आदिवासियों ने सरकार से गुलेल बटैलियन बनाए जाने की मांग की है। इस कदम का दोनों पक्ष और  विपक्ष ने समर्थन किया है l

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बीजेपी विधायक शांतिलाल बिलवाल ने कहा, ‘कानूनी बंधनों की वजह से आर्मी के जवान खुद का बचाव करने के लिए प्रदर्शनकारियों पर फायरिंग नहीं कर सकते। सरकार को इन युवाओं का इस्तेमाल करना चाहिए।’

वहीं, झाबुआ से कांग्रेस के पूर्व विधायक जेवियर मेधा ने एक कदम आगे बढ़ते हुए कहा पत्थरबाजी की समस्या से निपटने के लिए सरकार को ‘गुलेल पत्थरबाज दस्ता’ बनाना चाहिए।

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पुराने समय में किसान पक्षियों को उड़ाने के लिए गुलेल का इस्तेमाल किया करते थे। हाथ से पत्थर फेंके जाने की तुलना में गुलेल से 4-5 गुना ज्यादा तेज रफ्तार से पत्थर फेंके जा सकते हैं। लोगों ने इस तरीके को काफी शक्तिशाली बताया है .

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