इस नवाब ने आजादी के समय भारत में यहां फहराया था पाकिस्तानी झंडा

भारत की आज़ादी को 70 साल हो गये हैं और आज भी भारत में आज़ादी पूरी तरह से नहीं है, कहने का मतलब है कि देश में कई इलाके ऐसे ऐसे हैं जहां इंसान अपने मूल अधिकारों से भी वंचित है. देश में राजनीती करने वालों का स्तर इतना बढ़ गया है कि अपने लिए वो किसी की जान की भी परवा नहीं करते हैं.

 

 

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जब भारत आज़ाद हुआ था तो पूरे देश में जश्न मना था, हर कोई इस जश्न में शामिल हुआ और देश की आज़ादी की खुशियाँ मनाई लेकिन इस बीच भारत में एक जगह ऐसी भी थी जहां पाकिस्तान का झंडा लहराया गया था.

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दरअसल 15 अगस्त 1947 से पहले और बाद भोपाल के नवाब हमीदुल्लाह किसी भी हालत में भारत के साथ अपनी रियासत का विलय नहीं करना चाहते थे जिसके चलते वो इतने क्रूर हो गये थे कि आज़ादी की मांग करने वालों को तुरंत जेल में डाल देते थे.  बता दें उन्होंने एकीकरण के एग्रीमेंट पर साइन करने से मना कर दिया था. ख़ास बात ये थी कि वो पाकिस्तान को जन्म देने वाले जिन्ना के करीबी थे जिसके चलते उन्हें भारतीय सरकार की ओर से ज्यादा दबाव नहीं झेलना पड़ रहा था.

 

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भोपाल में फहराया गया था पाकिस्तानी झंडा ! 

लम्बी जंग के बाद जब दोनों देशों के आजादी की तारीख घोषित हो गई तो 14 अगस्त को भोपाल में पाकिस्तान का झंडा फहराया गया, बता दें पाकिस्तान में आज़ादी का जश्न 14 अगस्त को मनाया जाता है. बताया जाता है कि आज़ादी के कई साल बाद भी भोपाल के उस नवाब ने भारतीयों पर अत्याचार किया था और उन्हें प्रताड़ित भी किया.

 

 

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जब भारत को आजादी मिली तो जैसे-तैसे लोगों ने नवाबी सेना को चकमा देकर यहां के जुमेराती पोस्ट अॉफिस के पास तिरंगा फहरा दिया, इससे पहले यहां के नवाब समर्थक लोगों ने 14 अगस्त 1947 को भोपाल में कई जगह पाकिस्तान का झंडा फहराया था. इस घटना के बाद पूरी रियासत में तनाव रहा.

एक हफ्ते पहले निमंत्रण मिलने के बाद भी सिर्फ इस वजह से गाँधी नहीं हुए थे भारत की आज़ादी के जश्न में शामिल,

महात्मा गाँधी के बारे में आपने कई बातें पढ़ी होंगी और यह भी सभी जानते हैं कि महात्मा गाँधी को राष्ट्रपिता कहते हैं. आज हम आपको गाँधी जी के बारे में एक ऐसी बात बताने वाले हैं जिसे जानकर आपको यकीन नहीं होगा. दरअसल भारत की आज़ादी के जश्न में खुद महात्मा गाँधी शामिल नहीं हुए थे.

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वैसे तो महात्मा गाँधी का भारत की आज़ादी में सबसे अहम किरदार था लेकिन फिर भी हो भारत की आज़ादी से खुश नहीं थे, गाँधी को विभाजन के आधार पर मिली आज़ादी मंजूर नहीं थी जिसकी वजह से उन्होंने भारत की आज़ादी के जश्न में आना ठीक नहीं समझा.

 

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जब देश आज़ादी का जश्न मना था था तो गाँधी जी…

जब  देश आजादी का जश्न मना रहा था उस समय देश का यह पिता बंगाल के नोआखली में हिन्दू-मुस्लिम दंगों की आग भुजाने के लिए घूम रहे थे. बता दें नोआखाली में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द कायम करने के लिए गांधी जी गांव-गांव घूम रहे थे और  उनके पास धार्मिक पुस्तकें ही थीं. हिन्दुओं और मुसलमानों से शांति बनाए रखने की अपील की और उन्हें शपथ दिलाई कि वे एक-दूसरे की हत्याएं नहीं करेंगे.

 

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लौटा दिया था निमंत्रण ! 

महात्मा गाँधी ने पूरे आज़ादी की लड़ाई में कई महत्वपूर्ण फैसले लेकर भारत की आज़ादी में अहम योगदान निभाया था लेकिन उन्हें यह आज़ादी पसंद नहीं थी. आपको बता दें गाँधी को जश्न में शामिल होने के लिए निमंत्रण  भी भेजा था. आजादी मिलने की तारीख से सप्ताह भर पहले पटेल और नेहरू ने एक पत्र भी बापू को निमंत्रण के रूप में भेजा था, लेकिन उन्होंने पत्र लेकर आने वाले दूत को यह कहकर लौटा दिया कि देश में हिंदू और मुसलमान फिर झगड़ पड़े हैं, इसलिए मेरा वहां होना ज्यादा जरूरी है, इतना कहकर बापू कुछ दिनों बापू बाद बंगाल के लिए रवाना हो गए.

 

इसे भी पढ़ें महात्मा गाँधी की हत्या के पीछे का सच आया सामने नाथूराम गोडसे ने नहीं बल्कि..

महात्मा गाँधी, वो नाम है जिसके बारे में सभी जानते हैं, भारतीय करेंसी पर छपे इस फ्रीडम फाइटर की कहानी कुछ अलग है. भारतीय हिस्ट्री की हर एक किताब में शामिल महात्मा गाँधी के बारे में आप सभी जानते ही होंगे और ये भी जानते होंगे उनकी हत्या नाथूराम गोडसे ने गोली मारकार की थी.

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आपको बता दें कि ताजा मामला महात्मा गाँधी के हत्यारे को लेकर है क्या महात्मा गांधी का कोई दूसरा हत्यारा भी था? क्या गांधी को चौथी गोली भी मारी गई थी, जिसे नाथूराम गोडसे के अलावा किसी और ने चलाई थी? क्या उनकी मौत के लिए किसी और को जिम्मेदार ठहराने के पीछे कोई आधार है या नहीं? ऐसे कई सवाल सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में उठाए गए हैं.

गांधी की हत्या की जांच पर सवाल उठाते हुए इस याचिका में अनुरोध किया गया है कि नया जांच आयोग गठित करके गांधी की हत्या के पीछे की बड़ी साजिश का खुलासा किया जाए. यह याचिका अभिनव भारत, मुंबई के शोधार्थी और न्यासी डॉक्टर पंकज फड़नीस द्वारा दायर किया गया है.

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फड़नीस द्वारा दायर इस याचिका में दावा किया गया है कि वर्ष 1966 में गठित न्यायमूर्ति जे एल कपूर जांच आयोग पूरी साजिश का पता लगाने में नाकाम रहा. फड़नीस ने गोडसे और नारायण आप्टे सहित अन्य आरोपियों को दोषी ठहराने के लिए विभिन्न अदालतों द्वारा सही मानी गई तीन गोलियों की कहानी पर भी सवाल उठाए.

गौरतलब है कि आरोपियों को 15 नवंबर 1949 को फांसी पर लटकाया गया था, जबकि सावरकर को सबूतों के अभाव में संदेह का लाभ दिया गया. शीर्ष अदालत में याचिका दायर करने के साथ ही फडनीस ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी पत्र लिखकर सावरकर के खिलाफ कपूर आयोग द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने का अनुरोध किया है.

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अब देखना होगा की पीएम मोदी इस पत्र पर क्या फैसला लेते है. महात्मा गांधी की हत्या पर लिखे गए इस पत्र पर पीएम मोदी डॉक्टर पंकज फड़नीस को क्या जवाब देंगे.

 

 

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