भारतीय सैनिक आज राजीव गाँधी की इस भूल की वजह से खा रहे हैं कश्मीरी युवकों से पत्थर!

कश्मीर के मौजूदा हालात किसी से भी छिपे नहीं हैं| इन दिनों कश्मीर में अलगाववादी घटनाएं तेज़ी से पनप रही हैं|

इसका सबसे ताज़ा उदाहरण हाल ही में कश्मीर से आया एक वीडियो है जिसमे चुपचाप सड़क पर जा रहे भारतीय सेना के जवान पर कश्मीरी गद्दार पत्थर, लात और घूँसे बरसाते हुए “गो इंडिया गो बैक” के नारे लगा रहे हैं| इन नारों और कश्मीरियों की इस घटिया चाल से उनके मंसूबे साफ़ ज़ाहिर होते हैं|

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कश्मीर से आये सेना पर जुल्म के इस वीडियो को देखकर जहाँ एक तरफ हिन्दुस्तानियों का खून खौल उठा है तो वहीं दूसरी तरफ ये सवाल भी वाजिब तौर पर खड़ा होता है कि आखिर ऐसी क्या वजह हो सकती है जिसके चलते इन कश्मीरियों को हमारे सैनिक फूंटी आँख नहीं सुहाते? ऐसी क्या वजह है जिसके चलते आतंकियों से कश्मीरियों की रक्षा करने वाले हमारे सैनिकों को अंत में कश्मीरियों के पत्थर से इनाम मिलता है? ऐसी क्या वजह है जिसके चलते कश्मीर के छोटे-छोटे बच्चों तक के दिमाग में इस तरह का जहर भर गया है कि वो भी सेना पर हाथ उठाने से पहले दो बार नहीं सोचते?

तो चलिए आज आपके इन्ही सवालों का जवाब देते हुए बताते हैं कि दरअसल राजीव गाँधी की एक चूक की वजह से कश्मीरियों के दिमाग में भारत के लिए इतना जहर भर गया है जिसके चलते आज हमारे सैनिकों के साथ जुल्म हो रहे हैं |

जी हाँ! ये बात सुनने में चौंकाने वाली ज़रूर है लेकिन उससे भी ज्यादा सच | इस बात को तो कोई नहीं नकार सकता कि जम्मू-कश्मीर की घाटी में बढ़ रही आतंकवाद की घटनाओं और पत्थरबाजी की घटनाओं के पीछे पाकिस्तान का हाथ है। दरअसल भारत-पाक के बीच कश्मीर मुद्दे पर 1947 से ही जंग की शुरुआत हो गई थी और इसी वजह से पाकिस्तान ने कश्मीर पर कब्ज़ा जमाने के लिए तीन बार भारत से उलझने की कोशिश की पर बदले में उसे हर बार करारी हार ही मिली|

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कहा जाता है 1971 में भारत से जब पाकिस्तान को करारी शिकस्त मिली तो ये उससे बर्दाश्त नहीं हुआ और उसकी बदला लेने की नियत से पाक की काबुल स्थित पाकिस्तान की मिलिट्री अकादमी में सैनिकों को इस हार का बदला लेने की कसम दिलाई गई और अगले युद्ध की तैयारियां शुरू कर दी गईं। इन्ही सारी बातों के बीच अफगानिस्तान में हालात बिगड़ने की वजह से पाक सेना 1971 से 1988 तक अफगानिस्तान से युद्ध में जुटी रही। इस युद्ध में पाकिस्तान ने गुरिल्ला युद्ध के पैंतरे सीखे और अपने आप को युद्ध कौशल में निपुण बनाया।

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1988 में पाक के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जिया-उल-हक ने भारत के खिलाफ “ऑपरेशन टोपाक” के तहत एक योजना बनाई जिसको नाम दिया गया “वॉर विद लो इंटेंसिटी।” इस योजना के तहत कश्मीरियों के मन में अलगाववाद भरा जाना था और साथ ही भारत के प्रति नफरत पैदा करके उनके हाथों में भारत के खिलाफ हथियार थमाना था। अपनी इस योजना को सफल बनाने के लिए पाक ने भारत के पंजाब से शुरुआत की। पाकिस्तान ने इस मंशा से पाकिस्तानी पंजाब में सिखों को ‘खालिस्तान’ का सपना दिखाया और सिखों का हथियारबद्ध संगठन खड़ा किया।

भारत सरकार पाक की इस नापाक और घटिया चाल को समझ नहीं पाई और इस चक्रव्यूह में फंसती चली गई। स्वर्ण मंदिर में ऑपरेशन ब्लू स्टार और उसके बदले की कार्रवाई के रूप में 31 अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। इंदिरा की मौत के बाद देश की सत्ता राजीव गांधी के हाथ में आ गई लेकिन यहीं राजीव गांधी से एक चूक हो गयी| दरअसल राजीव गाँधी ने अपना सारा ध्यान कश्मीर की तरफ ना लगाकर पंजाब और श्रीलंका पर केन्द्रित किया।

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इस वजह से एक बार फिर पाक के मन में कश्मीर अधिग्रहण की नापाक ख्वाहिश जाग गई और पाक ने पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में लोगों के मन में भारत के खिलाफ जहर भरना शुरू किया और आतंकवाद की आग को हवा दी। कश्मीर मुद्दे पर भारतीय राजनेताओं की लापरवाही की वजह से ‘ऑपरेशन टोपाक’ बिना किसी मुश्किल के स्थानीय लोगों के मन में जहर भरता रहा।  इसके तहत पाक ने ना केवल घाटी में ही अशांति फैलाई बल्कि जम्मू व लद्दाख में भी अपनी शाखाएं फैला ली|

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कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद की वजह लगभग 7 लाख से ज्यादा कश्मीरी पंडित विस्थापित हो गए और जम्मू सहित देश के अन्य हिस्सों में जाकर बस गए| इसके बावजूद हजारों कश्मीरी पंडितों को जहां पाया गया वहीँ मार दिया गया। ‘ऑपरेशन टोपाक’ के ही तहत घाटी में गैर मुस्लिमों और शियाओं को वहां से खदेड़ना और जनता को बगावत के लिए उकसाना था।

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इसी के तहत कश्मीर में खुलेआम पाकिस्तानी झंडे फहराए गए और भारत की खिलाफत की गई। आज भी सबसे बड़े आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (‌ISIS) अपने इन्हीं नापाक मंसूबों को कश्मीरियों में जिंदा रखने के लिए आतंकवाद के लिए फंडिंग कर रहा है और भारत की खिलाफ़त कर रहा है।

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