सलमान खान सोचते हैं कि ईद पर फिल्म रिलीज होने से हिट हो जाएगी लेकिन जरा सुनिए ट्यूबलाइट देखकर इन लोगों ने क्या कहा

हजारों-करोड़ों की लागत से बनी सलमान खान की एक फिल्म जिसका उन्होंने काफी समय से ये सोच कर इंतज़ार किया कि अपने फैन्स के लिए इस फिल्म को ईदी के रूप में थिएटर में उतारना सही होगा लेकिन अब ट्यूबलाइट की जो प्रतिक्रियाएं लोग दे रहे हैं उसे देखकर ये साफ लगता है कि फैन्स का तो पता नहीं लेकिन सलमान की ईद ज़रूर ख़राब होने वाली है| वीकेंड है ऊपर से ईद का त्योहार तो जायज़ है कि बहुत से लोगों ने ट्यूबलाइट देखने जाने का मन बनाया होगा लेकिन एक बार अगर आप इन लोगों की प्रतिक्रिया सुन लेंगे तो शायद आप भी अपना इरादा बदल लें|

बात करें अगर फिल्म की तो 1962 की कहानी है| जिन्होंने फिल्म देखी उन्होंने ये बात साफ़ की है कि फिल्म अपने नाम तो शायद वजूद नहीं दी पाई| नाम ट्यूबलाइट लेकिन फिल्म ने एक सौ वाट के बल्ब जितना भी काम नहीं किया| हताश फैन्स ‘भाईजान’ की फिल्म देखकर यूँ तो अपनी ईद मनाने गए थे लेकिन फिल्म ने उन्हें सिर्फ निराशा ही दी|  फैन्स की माने तो फिल्म में निराशा आपको सिर्फ खान भाइयों की तरफ से ही नहीं बल्कि कबीर खान के निर्देशन से भी मिलेगा|

फिल्म में कुछ दिलचस्प मोड़ लाने के शाहरुख़ खान का भी कैमियो भी कराया गया लेकिन कहते हैं ना जब ट्यूबलाइट फुस्स ही थी तो कोई भी क्यों ना आ जाये वो कहाँ ही रौशनी देने वाली थी| हाँ लेकिन सौ खामियों के बावजूद अगर आप फिल्म के कुछ अच्छा ढूँढना चाहे तो वो है फिल्म की लोकेशन और लेट स्टार ओम पुरी का दिलचस्प अभिनय| सिल्वर स्क्रीन पर एक बार फिर या ये कहिये आखिरी बार ओम पुरि को देखकर शायद आपको आपकी महंगी टिकट उतनी ना खले|

लोगों ने जहाँ एक तरफ विदेशी एक्ट्रेस जूजू को देखकर उम्मीदें बढ़ा लीं थी लेकिन कबीर खान की ये कोशिश भी नाकाम रही| हालाँकि फिल्म में बाल कलाकार मातिन ने अपनी चंचल अदाओं से लोगों का दिल जीता लेकिन इतना भी नहीं की सलमान के दिए घाव भर सकें|  सलमान के जिन कंधों पर दारोमदार था, उन्हें डायरेक्टर ने कमजोर कर दिया यानी की ट्यूबलाइट नहीं जली।

देखिये वीडियो: 

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बात करें अगर फिल्म की कहानी की तो ट्यूबलाइट 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है। कम उम्र में ही अपने मां-पिता को खो देने वाले लक्ष्मण सिंह बिष्ट  के किरदार में सलमान खान और भरत सिंह बिष्ट का किरदार निभा रहे सोहेल खान पहाड़ों में चीन की सीमा से लगे जगतपुरा में रहते हैं। युद्ध केसमय जब सैनिकों की भर्ती हो रही होती है तो मंदबुद्धि लक्ष्मण पीछे रह जाते हैं जबकि भरत सेना में भर्ती हो जाता है। कहानी आगे बढती है और चीनी मूल के मां-बेटे जुजु और मातिन  कलकत्ता से जगतपुरा रहने आ जाते हैं। दोनों खुद को हिंदुस्तानी मानते और कहते हैं जिस पर लक्ष्मण भरोसा भी करता है लेकिन बाकी लोग उस जैसे भोले नहीं हैं। बुरी खबरों के बीच लक्ष्मण को यकीन है कि भाई जरूर लौटेगा।

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फिल्म में जादू भी भर-भर के डाला गया है| इसी जादू को आजमाते हुए  लक्ष्मण ये देखना चाहता है कि क्या वह सिर्फ अपने यकीन से सामने खड़े पहाड़ की चट्टान हिला सकता है? लेकिन उसी पल भूकंप आ जाता है। बस फिर क्या था युद्ध रोकने के लिए भी लक्ष्मण अपना यकीन आजमाता है और युद्ध रुकने की खबर आ जाती है, लेकिन लक्ष्मण का भाई?   क्या भरत वो वापिस लौट पायेगा? तो जवाब है नहीं वो दरअसल चीनियों की कैद से भागते हुए  गोली खा चुका है।  यानी फिल्म की कहानी में यूँ तो कोई कमी नहीं है लेकिन उसको पर्दे पर ढंग से उतारने में खान भाई और कबीर खान दोनों ही नाकाम रहे|

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