जिससे कांपते हैं मुस्लिम देश वो भारत से रखना चाहता है एक खास रिश्ता, उसकी असली वजह जानते हैं आप !

इज़राइल दुनिया का एक मात्र यहूदी देश है जिसके विरोधी उससे खौफ खाते हैं. इज़राइल एक ऐसा देश जो अपने दुश्मनों से घिरा होने के बावजूद विकास में आगे खड़ा है. भारत और इज़राइल में कुछ ऐसी समानताएं हैं जो एक-दूसरे के रिश्ते को और मजबूत बनाते हैं. पीएम मोदी 4 जुलाई से 6 जुलाई तक इज़राइल के दौरे पर हैं और ऐसा करने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं. इसे आप दुर्भाग्य ही कह सकते हैं कि दोनों देशों के बीच काफी समानताएं होने के बाद भी भारत के पिछले प्रधानमंत्रियों ने इस देश का दौरा करना ठीक नही समझा लेकिनी देश में मोदी सरकार होने के बाद अब इज़राइल से सम्बन्ध और मजबूत होने की उम्मीद है. आपको बता दें कि इज़राइल मोदी के इस दौरे से बेहद खुश और उत्सुक भी है. आज हम आपको बता दें इज़राइल की कुछ मजेदार किस्से और भारत से उसकी समानता कि कैसे दोनों देश एक दूसरे के लिए बेहद खास हैं. JHL

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दोनों देशों की आज़ादी:

जैसा कि आप जानते हैं कि भारत कई सालों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा और 1947 में आज़ादी मिली इज़राइल का भी इतिहास कुछ ऐसा ही है. इज़राइल अलग देश होने से पहले फिलिस्तीन का हिस्सा था और फिलिस्तीन उस्मान साम्राज्य का हिस्सा था. यहूदियों की जनसख्याँ आप इसी बता से लगा लीजिए कि 1878 में उस्मान साम्राज्य में 87% मुस्लिम, 10% इसाई और 3% यहूदी लोग थे. धीरे-धीरे साम्राज्य में हिंसक घटनाओं के बढ़ने से 1900 में  इज़राइल की स्थापना के लिए आवाज उठने लगीl सीयनीज्म आंदोलन से मांग की जाने लगी इज़राइल को फिलिस्तीन से अलग कर दिया जाय. दूसरे विश्व युद्ध के बाद उस्मान साम्राज्य का पतन होने के कारण ब्रिटेन फिलिस्तीन को अपने अधीन कर लिया उसपर राज करने लगा. बेलफोर्स घोषणा कर के अंग्रेजों ने यहूदियों के लिए अलग देश इज़राइल की मांग का समर्थन किया. इसके पीछे उनकी “फूट डालो और शासन करो” की नीति थी.

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अरब के लोगों और यहूदियों में होने लगी जब हिंसा

इस चीज को बढ़ावा देने के लिए अंग्रेजों ने यहूदियों को एक साथ आकर रहने की सहमती दे दी. इससे हुआ ये कि बड़ी संख्या में यहूदी फिलिस्तीन की तरफ रुख करने लगे. यहूदी फिलिस्तीन तो आ गये लेकिन यहां आकर हालात और बिगड़ने लगे. फिलिस्तीन आकर ये लोग जमीन को कब्जा कर खेती करने लगे. यहूदियों की संख्या बढती गयी और पहले से रह रहे अरब लोगों में इसके कारण हिंसा होने लगी. जब मामला बिगड़ने लगा तो 1930 में अंग्रेजों ने अप्रवासन को सीमित करने का फैसला लिया. अंग्रेजों के द्वारा यहूदियों को एक साथ न रहने देने के आदेश के बाद मामला इतना आगे बढ़ गया कि यहूदियों ने लड़ाकों का गठन करना शूरू कर दिया. जिसका नतीजा ये हुआ कि अंग्रेजों को भगाने की भी तैयारी शुरू हो चुकी थी.

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अंग्रेजों के पसीने छुड़ा दिए:

ये वो वक्त था जब भारत भी अंग्रेजों के अधीन था और आज़ादी की मांग उठ चुकी थी, देश में वीर सपूतों ने अपने जान की बाजी लगा चुके थे उअर देश को आजाद कराने के लिए क्रांति की आग चल रही थी. उधर अंग्रेजों के सख्ती के बाद भी यहूदी एक साथ रहने के लिए इकट्ठा रहने के लिए फिलिस्तीन के लिए कूच कर रहे थे. एक तरफ द्वितीय विश्व युद्ध के खत्म हुआ तो जुलाई 1946 तक लगातार 6 सालों के युद्ध से ब्रिटेन कमजोर पड़ गया था और दूसरी तरफ यहूदियों के अप्रवासन का सिलसिला जारी रहा.

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UN को होना पड़ा शामिल तब हुआ बंटवारा:

इज़राइल की मांग को लेकर हिंसा बढ़ती जा रही थी और इसे रोकने में अंग्रेज नाकाम हो रहे थे और अंत में हारकर यूएन से इस मसले का हल निकालने को कहा. नवंबर 1947 में UN ने फिलिस्तीन को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला लिया. पहला हिस्सा यहूदियों को, दूसरा अरब को तीसरा येरुशलम. 14 मई 1948 में अंग्रेजी राज खत्म होते ही इजरायल एक अलग देश घोषित हो गया.

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दोनों देशों में समानताएं:

अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इज़राइल और भारत में कितनी समानताएं है, पहली ये कि अलग होने से पहले यहां के लोग अंग्रेजों के गुलाम थे हमारी तरह और दोनों देशों को आज़ादी भी एक साल में अन्तर पर मिली. आज़ादी के बाद भारत भी तीन टुकड़ों में बंटा और इज़राइल भी तीन टुकड़ों का एक हिस्सा है. इज़राइल अपने दुश्मनों से घिरा हुआ है लेकिन फिर भी दुश्मनों को धूल चटाता रहता है, वहीं भारत की सीमा पर भी दुश्मनों की नजर बनी रहती है और आये दिन मुंह की खाते रहते हैं. चूँकि अब मोदी इसराइल के दौरे पर हैं तो ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि दोनों देश में काफी प्रगाढ़ सम्बन्ध स्थापित होंगे.

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