भारत के 10 खूंखार सरगना जिन्होंने हिलाकर रख दी दुनिया…

 10. भूपत सिंह चौहाण

भूपतसिंह के कहर से जहां राजे-रजवाड़े और अंग्रेज कांपा करते थे, वहीं गरीबों के दिल में उसके लिए सर्वोच्च स्थान था। यही कारण था कि उसे ‘इंडियन रॉबिनहुड’ कहा जाता था जिसे कभी पुलिस पकड़ नहीं पाई। भूपत की कई क्रूरताभरी कहानियां हैं तो कई उसकी शौर्यगाथाओं और गरीबों के प्रति उसके प्रेम का गुणगान करती हुई भी हैं।

भूपत सिंह राज्य का धाकड़ खिलाड़ी था। दौड़, घुड़दौड़, गोला फेंक में कोई उसका कोई सानी नहीं था। लेकिन उसकी जिंदगी में ऐसी घटनाएं हुईं कि उसने हथियार उठा लिए। दरअसल, भूपत के जिगरी दोस्त और पारिवारिक रिश्ते से भाई राणा की बहन के साथ उन लोगों ने बलात्कार किया जिनसे राणा की पुरानी दुश्मनी थी। जब इनसे बदला लेने राणा पहुंचा तो उन लोगों ने राणा पर भी हमला कर दिया। भूपत ने किसी तरह राणा को बचा लिया, लेकिन झूठी शिकायतों के चलते वह खुद इस मामले में फंस गया और उसे काल-कोठरी में डाल दिया गया। बस, यहीं से खिलाड़ी भूपत मर गया और डाकू भूपत पैदा हो गया। भूपत ने जेल से फरार होते ही राजाओं और अंग्रेजों के खिलाफ जंग ही छेड़ दी थी।

भूपत सिंह ने सैकड़ों बार पुलिस को चकमा दिया। देश आजाद होने के बाद 1948 में भूपत के कारनामे चरम पर पहुंच गए थे और पुलिस भूपत को रोकने और पकड़ने में पूरी तरह नाकाम हो गई थी। 60 के दशक में डाकू भूपत सिंह अपने तीन खास साथियों के साथ देश छोड़कर गुजरात के सरहदी रास्ते कच्छ से पाकिस्तान जा पहुंचा। कुछ समय बाद उसने वापस भारत आने का इरादा किया, लेकिन भारत-पाक पर मचे घमासान के चलते उसके लिए यह मुमकिन नहीं हुआ।
अंतत: पाकिस्तान में उसने मुस्लिम धर्म अंगीकार कर लिया और अब पाकिस्तान में उसे अमीन यूसुफ के नाम से जाना जाता है। धर्म-परिवर्तन के बाद उसने मुस्लिम लड़की से निकाह किया। उसके 4 बेटे और 2 बेटियां हुईं। हालांकि उसने व उसके अन्य साथियों ने भारत आने की कई कोशिशें कीं, लेकिन उसकी यह इच्छा पूर्ण नहीं हो सकी और पाकिस्तान की धरती पर ही 2006 में उसकी मौत हो गई। उसे मुस्लिम रीति-रिवाजों से दफना दिया गया l

 

9. संतोख बेन जडेजा

 

‘गॉडमदर’ के नाम से प्रसिद्ध संतोख बेन जड़ेजा पर एक फिल्म भी बन चुकी है। शबाना आजमी ने इसमें लीड रोल किया है। वर्ष 1999 में प्रदर्शित फिल्म ‘गॉडमदर’ में शबाना आजमी ने एक ऐसी महिला का किरदार निभाया, जो अपने पति की मौत के बाद माफिया डॉनबनकर भ्रष्ट राजनीतिक व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाती है और अपने पति की मौत का बदला लेती है।उसका एक बेटा है जिसका नाम कंधल जड़ेजा है। ‘लेडी डॉन’ के नाम से मशहूर, एक समय में आतंक का पर्याय रह चुकी और जीवन में कई घातक हमलों में बचने वाली गॉडमदर संतोख बेन जड़ेजा (63) का 5 अप्रैल 2011 को हृदयाघात से निधन हो गया।

8. चार्ल्स शोभराज 

चार्ल्स शोभराज को कौन नहीं जानता? दुनिया के सबसे शातिर और खतरनाक सीरियल किलर्स चार्ल्स शोभराज को ‘बिकिनी किलर’ भी कहा जाता है। माना जाता है कि 1972-1976 के बीच उसने 24 लोगों की हत्या की थी। उसकी चर्चा इसलिए भी की जाती है कि उसने दुनियाभर की पुलिस को खूब चकमा दिया। भेष बदल-बदलकर वह कई देशों का दौरा करता था। हर बार पुलिस के हाथ से बच निकलने के कारण चार्ल्स शोभराज को सर्पेंट (सांप) के नाम से भी जाना जाता था।
भारतीय पिता की संतान चार्ल्स शोभराज का वास्तविक नाम हतचंद भाओनानी गुरुमुख चार्ल्स शोभराज है। 1970 के दशक में दक्षिण-पूर्वी एशिया के लगभग सभी देशों में विदेशी पर्यटकों को अपना शिकार बनाने वाला चार्ल्स शोभराज चोरी और ठगी का भी माना हुआ खिलाड़ी है।वर्ष 2008 में नेपाल में सजा काटने के दौरान चार्ल्स शोभराज ने अपने से बहुत छोटी आयु की नेपाली युवती निहिता बिस्वास के साथ जेल में ही विवाह संपन्न किया। हालांकि नेपाल जेल प्रशासन लगातार इस बात से इंकार करता रहा। चार्ल्स के जीवन पर अब तक 4 किताबें लिखी गईं और 3 डॉक्यूमेंट्री बन चुकी हैं।

 

7. दाऊद इब्राहीम और छोटा राजन

जुर्म की दुनिया के दो दोस्त छोटा राजन और दाऊद इब्राहीम अब दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्‍मन हैं। छोटा राजन ने ‘डी’ गैंग के कम से कम 3 बड़े गुंडों का भारत से बाहर कत्ल करवाया। इनमें दुबई में हुआ सुनील सावंत उर्फ सावत्या का कत्ल, दुबई में ही हुआ शरद शेट्टी का मर्डर और नेपाल में दाऊद के खासमखास मिर्जा दिलशाद बेग का खून प्रमुख है। अंडरवर्ल्ड के 3 और नाम हैं- हाजी मस्तान, अरुण गवली और रवि पुजारी। इसके अलावा प्रारंभिक दौर में वरदराजन मुदलियार (वरदाभाई), भाई ठाकुर, करीम लाला आदि के नाम भी चलते थे। इन सभी पर बॉलीवुड के निर्माता-निर्देशक हरदम फिल्म बनाने के लिए उतावले रहे हैं।

 

6. रंगा और बिल्ला 

रंगा और बिल्ला ने 1978 में 2 बच्चों की नृशंस हत्या कर दी थी। यह कांड देश ही नहीं, विदेश में भी खासा चर्चित हुआ था। यह दौर ही ऐसा था जबकि बच्चों की हत्या करने के मामले में कोई सोच भी नहीं सकता था l

हालांकि अब देश में कई रंगा और बिल्ला पैदा हो गए हैं, लेकिन रंगा और बिल्ला द्वारा किए गए जघन्य कांड के बारे में आज भी लोगों को मालूम है। रंगा और बिल्ला ने एक सैन्य अधिकारी के बच्चों को अगवा कर दुष्कर्म के बाद उनको मौत के घाट उतार दिया था। केस चलने के बाद दोनों को फांसी दे दी गई।कुलजीत सिंह उर्फ रंगा और जसबीर सिंह उर्फ बिल्ला ने 29 अगस्त 1978 को संजय और गीता चोपड़ा का फिरौती के लिए अपहरण कर लिया। 3 दिन बाद दोनों भाई-बहनों के शव बरामद किए गए। रंगा-बिल्ला को एक ट्रेन से गिरफ्तार किया गया और 4 साल तक चली सुनवाई के बाद 1982 में उन्हें फांसी दे दी गई। दोनों बच्चों के नाम पर बाद में वीरता पुरस्कार शुरू किया गया, जो हर साल दिया जाता है।

 

5.बंटी चोर

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मजबूत चरित्र का मतलब यह नहीं होता कि आप सदाचारी हैं, नैतिक हैं, धार्मिक हैं। मजबूत चरित्र का मतलब है, जो आप ठानते हैं, वो करते हैं। आप ढुल-मुल नहीं हैं। बिग बॉस में आए-गए देवेंद्र उर्फ बंटी मजबूत चरित्र की सबसे ताजा मिसाल हैं।

बंटी वही शख्स है, जिस पर चोरी के पाँच सौ मुकदमे चले व चल रहे हैं। इसी के जीवन पर बनी थी फिल्म “ओए लकी लकी ओए”। मगर बंटी का आत्मसम्मान ऐसा है कि वो सार्वजनिक तौर पर चोर पुकारा जाना कबूल नहीं करता।

 

4. ठग बहराम

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बहराम एक बार जिस रास्ते से गुजरता था, वहां लाशों की ढेर लग जाती थी. वह पीले रुमाल से लोगों की हत्या करता था. 1790 से 1840 तक उसने 931 हत्याएं कीं। वह अपने शिकार की हत्या उनका गला दबाकर किया करता था।दिल्ली से लेकर ग्वालियर और जबलपुर तक उसका इस कदर खौफ हो गया था कि व्यापारियों ने रास्ता चलना बंद कर दिया था.

काफिले के लोग जब सो जाते थे, तब ठग गीदड़ के रोने की आवाज में हमले का संकेत देते थे. इसके बाद गिरोह के साथ बहराम ठग वहां पहुंचा जाता. अपने पीले रुमाल में सिक्का बांधकर काफिले के लोगों का गला घोंटता जाता था. लोगों की लाश को कुओं आदि में दफन कर दिया जाता था. बहराम की गिरफ्तारी के बाद उसके गिरोह के बाकी सदस्य भी गिरफ्तार कर लिए गए lठग बहराम के कारण अंग्रेज सरकार को ठग विरोधी कानून बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ के अनुसार सन् 1790-1840 के बीच महाठग बहराम ने 931 सीरियल किलिंग की, जो कि विश्च रिकॉर्ड है। वर्ष 1840 में उसे अंग्रेज सरकार ने सजा-ए-मौत दे दी।

3.वीरप्पन

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बड़ी-बड़ी मुछों वाले चंदन तस्कर वीरप्पन को पकड़ने के चक्कर में कई पुलिस वाले और जवान शहीद हो गए। दक्षिण भारत के कुख्‍यात ‘वीरप्पन’ के नाम से प्रसिद्ध कूज मुनिस्वामी वीरप्पन का जन्म गोपीनाथम नामक गांव में 1952 में एक चरवाहा परिवार में हुआ था। कर्नाटक, तमिलनाडु और केरल के जंगलों में था वीरप्पन का राज। तीनों ही राज्यों की पुलिस उसको पकड़ने के लिए अभियान चला रही थी।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और वन अधिकारियों समेत 184 लोगों की हत्या, 200 हाथियों के शिकार, 26 लाख डॉलर के हाथीदांत की तस्करी और 2 करोड़ 20 लाख डॉलर कीमत की 10 हजार टन चंदन की लकड़ी की तस्करी से जुड़े मामलों में पुलिस को वीरप्पन की तलाश थी। हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि उसने लगभग 2,000 हाथियों की हत्या की थी।चंदन की तस्करी के अतिरिक्त वह हाथीदांत की तस्करी, हाथियों के अवैध शिकार, पुलिस तथा वन्य अधिकारियों की हत्या व अपहरण के कई मामलों का भी अभियुक्त था। कहा जाता है कि उसने कुल 2,000 हाथियों को मार डाला, पर उसकी जीवनी लिखने वाले सुनाद रघुराम के अनुसार उसने 200 से अधिक हाथियों का शिकार नहीं किया होगा।उसका 40 लोगों का गिरोह था, जो वीरप्पन के कहने पर शिकार, अपहरण, हत्या आदि की वारदात को अंजाम देता था। मशहूर कन्नड़ अभिनेता राजकुमार को वीरप्पन ने सन् 2000 में अगवा करवा लिया था। राजकुमार की रिहाई के लिए उसने बहुत मोटी रकम वसूली थी।बड़ी मुश्‍किलों के बाद 1986 में वीरप्पन को एक बार पकड़ लिया गया था लेकिन वह भाग निकलने में सफल रहा। उसने एक चरवाहा परिवार की कन्या मुत्थुलक्ष्मी से 1991 में शादी की। उसकी 3 बेटियां थीं- युवरानी, प्रभा तथा तीसरी के बारे में कहा जाता है ‍कि वीरप्पन ने ही उसकी गला घोंटकर हत्या कर दी थी।वीरप्पन मां काली का बहुत बड़ा भक्त था। वह कई पक्षियों की आवाज निकाल लेता था। उसने अंग्रेजी की फिल्म ‘द गॉडफादर’ कई बार देखी। उसके पास एक प्रशिक्षित कुत्ता और एक बंदर था। उसे कर्नाटक संगीत पसंद था। उसकी इच्छा थी कि वह एक अनाथाश्रम खोले तथा राजनीति से जुड़े। वीरप्पन को साम्यवादी विचारधारा पसंद थी। वीरप्पन को लगता था कि उसकी बहन मारी तथा उसके भाई अर्जुनन की हत्या के लिए पुलिस जिम्मेवार थी।1990 में कर्नाटक सरकार ने उसे पकड़ने के लिए एक विशेष पुलिस दस्ते का गठन किया। जल्द ही पुलिस वालों ने उसके कई आदमियों को पकड़ लिया। फरवरी 1992 में पुलिस ने उसके प्रमुख सैन्य सहयोगी गुरुनाथन को पकड़ लिया। इसके कुछ महीनों के बाद वीरप्पन ने चामाराजानगर जिले के कोलेगल तालुका के एक पुलिस थाने पर छापा मारकर कई लोगों की हत्या कर दी और वह हथियार तथा गोली-बारूद लूटकर ले गया। 1993 में पुलिस ने उसकी पत्नी मुत्थुलक्ष्मी को गिरफ्तार कर लिया। अंतत: 18 अक्टूबर 2004 को उसे मार गिराया गया। उसकी मौत पर कई तरह के विवाद हैं। वीरप्पन की पत्नी का कहना है कि उसे कुछ दिन पहले ही गिरफ्तार कर लिया गया था। वीरप्पन ने कई बार चेतावनी दी थी कि यदि उसे पुलिस के खिलाफ किसी मामले में फंसाया जाता है तो वो हर एक पुलिस वाले की ईमानदारी पर उंगली उठा सकता है, इस कारण से उसकी हत्या कर दी गई।

 

2. मिस्टर नटवरलाल

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 ठगी का पर्यायवाची नाम है ‘मिस्टर नटवरलाल’। नटवरलाल को कोई भी उनके असली नाम मिथिलेश कुमार श्रीवास्तव से नहीं जानता। चालाकी और ठगी को ललित कला बना देने वाला यह शख्स अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन उस पर बहुत सारी किताबें लिखी गईं और एक फिल्म बनी- ‘मिस्टर नटवरलाल’ जिसमें अमिताभ बच्चन हीरो थे। ‘दो और दो पांच’, ‘हेराफेरी’ और हाल ही है बनी फिल्म ‘राजा नटवरलाल’ जैसी फिल्में भी उसके जीवन से प्रेरित हैं। देश के सारे ठग नटवरलाल का नाम बड़ी इज्जत से लेते हैं।नटवरलाल की प्रसिद्धि इसलिए भी है कि उसने ताजमहल, लाल किला, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन को वास्तविक जीवन में बेच दिया था। अमीर लोगों ने उसकी बातों पर यकीन भी कर लिया। खुद नटवरलाल ने एक बार भरी अदालत में कहा था कि ‘सर, अपनी बात करने की स्टाइल ही कुछ ऐसी है कि अगर 10 मिनट आप बात करने दें तो आप वही फैसला देंगे, जो मैं कहूंगा।’लगभग 75 साल की उम्र में दिल्ली की तिहाड़ जेल से कानपुर के एक मामले में पेशी के लिए उत्तरप्रदेश पुलिस के दो जवान और एक हवलदार उसे लेने आए थे। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से लखनऊ मेल में उन्हें बैठना था। स्टेशन पर खासी भीड़ थी। पहरेदार मौजूद थे और नटवरलाल बेंच पर बैठा हाफ रहा था। उसने सिपाही से कहा कि बेटा बाहर से दवाई की गोली ला दो। मेरे पास पैसा नहीं है लेकिन जब रिश्तेदार मिलने आएंगे तो दे दूंगा। अब बेचारे सिपाही को क्या मालूम था कि परिवार और रिश्तेदार उसे लाइक नहीं करते थे। पत्नी की बहुत पहले मौत हो गई थी और उसकी कोई संतान नहीं थी। सिपाही दवाई लेने गया, आखिर दो पहरेदार मौजूद थे। इनमें से एक को नटवरलाल ने पानी लेने के लिए भेज दिया। बचा अकेला हवलदार तो उससे नटवर ने कहा कि भैया तुम वर्दी में हो और मुझे जोर से पेशाब लगी है। तुम रस्सी पकड़े रहोगे तो मुझे जल्दी अंदर जाने देंगे, क्योंकि मुझसे खड़ा नहीं हुआ जा रहा। उस भीड़भाड़ में नटवरलाल ने कब हाथ से रस्सी निकाली, कब भीड़ में शामिल हुआ और कब गायब हो गया, यह किसी को पता नहीं। तीनों पुलिस वाले निलंबित हुए और कहते हैं कि नटवरलाल 60वीं बार फरार हो गया।नटवरलाल को अपने किए पर कोई पछतावा नहीं था। वह अपने आपको ‘रॉबिनहुड’ मानता था। कहता था कि मैं अमीरों से लूटकर गरीबों को देता हूं। उसने कहा कि मैंने कभी हथियार का इस्तेमाल नहीं किया।
1. फूलन देवी

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 फूलन देवी के जीवन पर एक बहुत ही मशहूर फिल्म बनी है ‘बैंडिट क्वीन’। फूलन देवी से दूर-दूर के गांव के रसूखदार लोग ही नहीं, डाकू भी कांपते थे। महिला डकैत फूलन देवी का जीवन बहुत ही संघर्षमय रहा लेकिन आत्मसमर्पण करने के बाद वह सांसद तक बन गई थीं।वो कभी गांव की एक आम लड़की हुआ करती थी जिसे केवल अपने परिवार से मतलब था। घर में बाहर से पानी लाना और पूरे परिवार के लिए खाना पकाना, फिर चैन की नींद सोना। बस यही उसका जीवन था। लेकिन अचानक उसके साथ हुई एक घटना ने उसे बंदूक उठाने को विवश कर दिया और चंबल के जंगलों के डाकू ही नहीं, पत्ता-पत्ता उसकी आवाज से कांपने लगा।

दरअसल, गांव के कुछ लोगों ने फूलन देवी के साथ बलात्कार किया था। बलात्कार करने वाले कुल 11 लोग थे। इस घटना के बाद फूलन देवी का जीवन बदल गया। परिवार ने न्याय की मांग के लिए कई दरवाजे खटखटाए, लेकिन हर तरफ से उसे मायूसी ही हाथ लगी। न्याय नहीं मिलने पर मजबूर हुई फूलन देवी ने बंदूक उठा ली और डाकुओं के गिरोह में शामिल हो गई। एक दिन फूलन अपने पूरे लाव-लश्कर के साथ गांव में पहुंची और उसके साथ बलात्कार करने वाले 11 लोगों को एक-एक कर लाइन में खड़ा कर गोलियों से भून दिया गया। वहां उसने कुल 22 लोगों की हत्या की।

साल 1981 में फूलन तब चर्चा में आईं जब उनके गिरोह पर बेहमई में सवर्ण जातियों के 22 लोगों की हत्या का आरोप लगा। ऐसा करने के बाद फूलन देवी देश ही नहीं, बल्कि पूरे विदेश में भी चर्चित हो गई। साल 1983 में इंदिरा गांधी सरकार ने उसके सामने आत्मसमर्पण करने का प्रस्ताव रखा।

फूलन देवी ने अपने व गैंग के सदस्यों के आत्मसमर्पण के लिए सरकार के सामने कई शर्तें रखीं। इसमें उसे या उसके किसी साथी को मृत्युदंड नहीं दिया जाए, उसे व उसके गिरोह के लोगों को 8 साल से ज्यादा सजा नहीं दिए जाने की शर्त थी। सरकार ने फूलन की सभी शर्तें मान लीं। शर्तें मान लेने के बाद ही फूलन ने अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण किया था।बिना मुकदमा चलाए फूलन को 11 साल तक जेल में रखा गया। 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने उसे रिहा कर दिया। 1996 में फूलन देवी ने समाजवादी पार्टी के टिकट पर उत्तरप्रदेश के मिर्जापुर सीट से लोकसभा चुनाव लड़ा और जीत गई। 1998 में वह चुनाव हार गई लेकिन 1999 में फिर से जीतकर दोबारा संसद पहुंची।

साल 2001 में शेरसिंह राणा ने दिल्ली में फूलन देवी की उनके आवास पर गोली मारकर हत्या कर दी। जब फूलन की हत्या की गई तब वह मिर्जापुर से सांसद थी। फूलन की मौत को एक राजनीतिक साजिश भी माना जाता है। उनके पति उम्मेद सिंह पर भी आरोप लगे थे, लेकिन वे साबित नहीं हो सके थे।

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