अमरनाथ हमले की आपबीती बताते हुए इस शख्स ने बताया कि हमारी बस के पीछे आतंकी थे लेकिन हमने दुकानदारों से मदद मांगी तो उन्होंने ये कह कर मुंह फेर लिया कि…

सावन सोमवार और ऊपर से अमरनाथ यात्रा. हिन्दुओं की भाषा में या उनकी मान्यता की बात करे तो ये किसी धर्म, और जन्नत से कम नहीं होता. कहते हैं जिसने अमरनाथ की यात्रा कर ली  समझ लो उसने इसी ज़िन्दगी में भगवान शिव को साक्षात ही पा लिया. लेकिन ज़रा सोचिये अगर ऐसी ही किसी यात्रा पर कुछ ऐसा हो जाये की वहां गया इंसान कभी वापिस ही ना आ पाए तो? ऐसा ही कुछ हुआ अमरनाथ यात्रा पर गए कुछ ऐसे श्रद्धालुओं के साथ जो इस यात्रा के बाद अगर अपने साथ अपने घर कुछ लेकर गए हैं तो वो है खौफ, डर, आतंकियों के साथ मुठभेड़ के वो दर्दनाक कुछ पल.

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हमारी बस शायद गलत समय पर पंक्चर हो गयी थी 

हमले के चश्मदीद ने बताया कि हमारी बस बड़े ही उत्साह से निकली ही थी कि हमारी बस ख़राब हो गयी. समय हुआ था 5 बजकर 15 मिनट कि अचानक पहाड़ों के घुमावदार रास्तों पर हमारी बस, जिसमे लगभग 56 यात्री मौजूद थे, ख़राब हो गयी थी. इसके बाद भी ड्राईवर ने बस नही रोकी और वो सीधे बस को पंक्चर की दुकान पर ले गया. वहां जब तक बस ठीक हुई सभी यात्री नीचे उतरे थे और एक दूसरे से बातचीत की.  बस ठीक होते ही हम एक बार फिर अपनी मंजिल की तरफ निकल पड़े थे.

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और अचानक से ‘सेना’ ने हम पर हमला कर दिया 

ये हमला दुखद है. देश का हर इंसान इस वक़्त उन 7 श्रद्धालुओं की दुर्भाग्यवश मौत पर दुखी है, लेकिन ये जानने की आस तो शायद हम, आप या कहिये हर हिन्दुस्तानी के जहन में होगा कि उस रात आखिर हुआ क्या था? ऐसे में इस हमले के एक चश्मदीद ने इस हादसे से जुड़े कुछ ऐसे खुलासे किये हैं जिन्हें जानकर आपको भी दुःख तो होगा ही साथ ही अफ़सोस से सिर भी झुक जायेगा.

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इस हमले के एक चश्मदीद ने बताया कि हम उस शाम यात्रा के बाद थोड़े थक ज़रूर गए थे लेकिन हमारे जोश में ज़रा भी कमी नहीं आई थी. हम बस में बैठे थे कि तभी अचानक से हमारी बस पर गोलियां बरसने लगीं. हमे दो पल को कुछ समझ नहीं आया. बस में हर तरफ से ताबड़तोड़ गोलियां बरस रही थीं. हमे समझ नहीं आया कि आखिर सेना के जवान हम पर गोलियां क्यों बरसा रहे हैं?

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..लेकिन वो तो आतंकी थे

मौत को अपने बेहद करीब से देखने वाले इस चश्मदीद ने बताया कि उन्हें गोलियां बरसने के कुछ समय बाद पता चला कि वो सेना के जवान नहीं बल्कि देश के दुश्मन हैं. वो आतंकी थे. जब लोगों को आभास हुआ कि ये आतंकी हमला है वो खुद को बचाने के लिए जतन करने लगे. कोई सीट के नीचे छुप रहा था तो कोई एक दूसरे की आड़ में खुद को बचाने की कोशिश करने में लगा था.

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अबतक हमारी गाड़ी खून से लाल हो चुकी थी 

आतंकी हमारे खून के प्यासे थे. वो हर तरफ से हमपर गोलियां बरसा रहे थे. तभी बस में मौजूद हमारी बस ऑपरेटर के बेटे हर्ष को अंदाज़ा हो चुका था कि अब मामला हाथ से निकल चुका है. उन्हें किसी बड़े हमले की आशंका होते ही उन्होंने सबसे पहले ड्राईवर सलीम के सिर को झुका दिया जिससे उन्हें कुछ ना हो पाए लेकिन हर्ष खुद इतने खुशनसीब नहीं निकले. आतंकियों की एक गोली हवा को चीरते हुए आई और हर्ष को लग गयी.

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यात्रियों ने हर्ष को खून में लथपथ देखकर अपनी आखिरी आस भी छोड़ दी थी कि तभी 

चश्मदीद ने बताया कि उनकी आखिरी उम्मीद शायद हर्ष से ही बंधी हुई थी. उन्हें गोली लगी तो लोगों  ने भी अब अपनी जान की आस छोड़ दी. लेकिन हर्ष ने आस नहीं छोड़ी थी. गोलियां बरस रही थी और इसी बीच हर्ष लड़खड़ाते हुए यात्री दरवाज़े को लॉक करने की कोशिश करने लग गए. उन्हें पता था कि अगर गलती से भी कोई आतंकी बस में घुसने में कामयाब हो गया तो लोगों को बचाना नामुमकिन हो जायेगा.

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हर्ष ने सलीम को चिल्लाते हुए कहा, “बस चलाते रहो, रुकना मत”

हम अपनी-अपनी सीटों के नीचे दुबके थे. हमे कुछ समझ नहीं आ रहा था. लेकिन तभी हमे आवाज़ आई जब हर्ष भाई ने चिल्लाते हुए ड्राईवर सलीम को आदेश दिया कि कुछ भी क्यों ना हो जाये आप बस चलाते रहना, कहीं भी रुकना मत, और ड्राईवर सलीम ने बिलकुल वैसा ही किया. गोली का असर अब हर्ष पर होने लगा था और वो होश खो रहे थे. अब बस क्लीनर मुकेश भी सलीम का हौसला बढ़ाने के लिए सिर्फ सलीम को चलते रहने के लिए कहता है.

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हम अब आगे आ गए थे और हमे कुछ दुकानों दिखी…

ये सलीम भाई की बहादुरी ही थी कि अब हम आतंकियों से पीछा छुड़ाकर काफी आगे आ गए थे. हालाँकि बस पर गोलियां अभी भी लगातार चल रही थी. लोग सीटों के नीचे से सिसकियाँ ले रहे थे. हमारी बस कुछ आगे निकली तो हमे थोड़ी रौशनी और कुछ दुकाने दिखीं. वो आज हमरे लिए सिर्फ दुकान नहीं मदद की आस थीं लेकिन ये क्या….

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हमने दुकानदारों से मदद मांगी तो वो जोर-जोर से हंसने लगे   

हम जैसे ही दुकान के पास पहुंचे हमे थोड़ी आस जरुर बंधी थी लेकिन बस में से किसी के पास भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो बस से नीचे उतर सके. हमने बस की खिड़की से झांकते हुए वहां मौजूद लोगों से मदद की गुहार की. हमने कहा, ‘प्लीज हमारी मदद करो, हमे आपकी मदद चाहिए.” हम उम्मीद में थे कि हमे यहाँ मदद मिलेगी लेकिन दुकानदारों ने हमारी मदद करने के बजाय हम पर ज़ोर-जोर से हँसना शुरू कर दिया.

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हमारी आखिरी आस अब टूट चुकी थी कि तभी हमारे सामने एक गाड़ी आ कर रुकी 

मदद की आखिरी आस को भी खुद पर हँसते देखकर हमने सोच लिया था कि अब हमारी मदद को कोई नहीं आएगा कि तभी हमारे सामने एक गाड़ी आकर रुकी. हम फिर से शायद थोड़ा डर गए थे या यूँ कहिये इससे पहले कि हमें कुछ समझ आता कि तभी गाड़ी से भारतीय सेना के जवान उतरे. जवानों ने हमारे डरे-सहमे चेहरे देखे और हमसे कहा कि, “आप लोग डरिये मत, हम आपको बचाने आये हैं. हम भारतीय सेना के जवान हैं.”

अब सेना ने अपने हाथ में कमान लेते हुए हम में से घायलों को अस्पताल पहुँचाने का काम शुरू किया. अब एक बार फिर हमे लगने लगा कि शायद अब हम अपने परिवार वालों के पास सुरक्षित पहुँच जायें. सेना के जवानों ने हमे गाड़ियों में बैठाया और आश्वासित किया कि अब हम सुरक्षित हैं. देश के गद्दार जो अभी कुछ समय पहले ही पुलिस की वर्दी में उनपर हमला करने वाले आतंकी अब भाग चुके हैं.

(हमारा ये आर्टिकल दैनिक भास्कर में छपे एक लेख से प्रेरित है)